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Showing posts from November, 2018

सड़क

【सड़क】 ___________ एक हाईवे हमें भी पिघलाता है जर्रा जर्रा ... इससे तो बेहतर होता कि हम एक दूसरे से हजारों मील दूर रहते। ऐसे में कम से कम झूठी उम्मीदें तो नहीं पनपतीं, हर बारिश के बाद तुमको देखने की ख्वाहिश तो नहीं होती। ऊपर वाला बड़ा बेरहम स्क्रिप्ट राइटर है। वो जब किरदार रचता है तो मिटटी में बेचैनी गूंथ देता है और मुझ जैसे लोगों को फिर कभी करार नहीं आता.... इस कहानी के किरदार एक दूसरे से 150 किलोमीटर दूर रहते हैं। एक बार तो सोचता हूँ कहानी में किसी यूरोप के शहरों की सेटिंग दे दूँ। वहाँ शहर इतने खूबसूरत होते हैं कि पूछो मत, बरसातों और सर्दियों में खास तौर पर; लेकिन उस सेटिंग में मेरे किरदार नैचुरल नहीं महसूस करेंगे। उनके अहसासों में एक अजनबियत आ जायेगी। यूँ तो मुझे 'वियेना' और 'बर्न' बहुत पसंद है, पर उनकी बात फिर कभी... अपनी कहानी के किरदारों की बात करता हूँ । उन दोनों के शहरों के बीच हर तरह की कनेक्टिविटी है । बसें चलती है, प्राइवेट टैक्सी है, ट्रेन है, और उन्हें जोड़ने वाला हाइवे देश का सबसे खूबसूरत रास्ता माना जाता है। वो रहती है देश के सबसे साफ़-सुथरे सप...

मैं जो हूँ

【मैं जो हूँ】 ___________ जिंदगी का पथ मिला, चलने लगा हूँ साँसों से धड़कन मिली, जीने लगा हूँ वेदनाओं की लहरों का प्रवाह मद्धिम है नैराश्य का धुंधलका भी अब छंट चुका है, पिघले अहसास दिल को नम ही रखते हैं क्या भरोसा, कल रहूँ मैं या कि न रहूँ जिंदगी की ये कहानी मैं भला किससे कहूँ कौन समझेगा ये अहसासों की जुबां, कोई नहीं इसलिए सोचता हूँ कि खामोशी ही बेहतर है वह संघर्ष जो मेरा अपने आप ही से था जिस घुटन के दौर को मैंने है झेला यूँ तो कहने को सभी थे  साथ मेरे फिर भी कितनों के बीच में था अकेला कई बार तो जिंदगी में यूं भी हुआ है मंजिलों तक पहुंचकर है नाव डूबी इरादों के फौलाद ने मुझको तपाया आज जो हूँ हौसलों ने है बनाया शुक्रिया उनका जो कल थे साथ मेरे शुक्रिया उनका जो अब भी साथ में हैं इल्तिज़ा ये है कि जब भी हो अंधेरा बिखरने से पहले मेरा साथ देना हो सके तो बस ये याराना निभाना... NeeRaj K. Gupta

ख़्वाब और उजाला

#ख़्वाब_और_उजाला खुली आँखों से एक ख्वाब पढ़ रहा था उस रोज़, दिलचस्प सा ख्वाब था वो, हर एक हर्फ ख़याल की गाढ़ी स्याही में लिखा उजालों का भी शोर बहुत था उस रोज़, मैं ख़्वाब में डूबा हुआ यूँ तो बेख़बर था; मगर किसी एक आवाज़ ने पुकारा था मुझे...... रोशनी के भरम और ख़यालों की हक़ीक़त में फ़र्क नहीं कर पाया मैं शायद अपनी नींद का एक सिरा ख़्वाब के पन्नों के बीच दबाकर उस आवाज़ को ढूँढता रहा हूँ मैं अब तक शोर आज भी बहुत होता है इन उजालों  में कई आवाजें बहुत सी मिलती जुलती हैं उस आवाज़ से... मगर मैं जानता हूँ; वो आवाज़ उसी ख्वाब से आई थी नींद का वो सिरा हटाकर फिर वही ख़्वाब टटोलने की कोशिश करता हूँ हर रात मगर वो आख़िरी हर्फ़ जो पढ़ा था उससे आगे जाया नहीं जाता मुझसे मुझे उस ख़्वाब की हक़ीक़त में ही रहना था; उजाले अक्सर दगा किया करते हैं..... NeeRaj K. Gupta

बेनाम शायर

हर रोज दिन होता है और ढलता है हर रोज सुरमई सी शाम चली आती है हर रोज ही रात होती है, मैं होता हूँ और होती हैं यादें हर रोज कोई ख़याल भी जहन में आ ही जाता है किसी-किसी रोज़ यूँ भी होता है जब कि कोई ख़याल रंग देता है मन को कई ख़यालों के रंग भी अलग होते हैं इसलिए ये ख़याल भी टुकड़ों में आते हैं मुझ तक मेरी रंगत का कोई टुकड़ा सम्हाल के रख लेता हूँ फुरसत मिले तो जोड़ने बैठ जाता हूँ इनको वैसे भी बेनाम सा शायर हूँ तलफ़्फ़ुज़ क्या जानूँ इन ख़यालों के रंग कुछ अल्फ़ाज़ दे जाते हैं मैं भी बस इक आस में ही रहता हूँ अक्सर भूले से शायद कोई नज़्म बन ही जाये, न बने तो ये ज़िंदगी तो आखिर है ही.. NeeRaj K. Gupta

कोई तो कहे

#कोई_तो_कहे इश्क़ तहज़ीब है ऐसी जो सिखाई नहीं जाती इश्क़ करने के तरीके किताबों में नहीं मिलते इश्क़ गहराई है दिल के अहसासों की इश्क़ जब होता है तो बस यूं ही होता है दिल जो खोता है तो बस यूं ही खोता है किसी की अल्हड़ सी हँसी, या कि किसी का यूं ही शरमाना किसी की गुंथी चोटी या कि खुली जुल्फें किसी के रुख़सार की मीठी सी नज़र किसी के बातों में घुला जादू सा असर इश्क़ किस बात पर हो जाये ये कहाँ दिल को पता ये वो हादसे हैं जो दिल को अजीज होते हैं.. इंतज़ारी है कि किसी रोज कुछ ऐसा हो कोई आये और मुझसे ये खुलेआम कहे मुझे इश्क़ है तुमसे, तुम मेरे दिल में रहते हो कसम इश्क़ की, हम इश्क़ में फना हो जाएं #इश्क़_इबादत NeeRaj K. Gupta

शकारि विक्रमादित्य

【शकारि विक्रमादित्य】 ★★★★★★★★★★ विन्ध्य पर्वत की उपत्यकाओं में नाद करती रेवा के समीप एक अत्यंत गहन वनप्रांत में एक अश्वारोही तीव्र वेग से चला जा रहा था। उसे शीघ्रता थी महाकाल की नगरी अवन्तिकापुरी पहुँचने की। यह वह समय था जब अवन्तिका नगरी पर परमारवंशीय महाराज विक्रमादित्य का शासन था। सिंध, पंचनद और राजस्थान को रौंदती हुई विध्वंसक और क्रूर शकों की सेना अनियंत्रित गजों की भाँति मालव-प्रांत की ओर बढ़ी आ रही थी, और यही उस अश्वारोही की चिंता थी। उसे शीघ्र ही यह सूचना महाराज को देनी थी। उसे दिन ढलने से पूर्व ही अवन्तिका नगरी में पहुँचना था। उन दिनों अवन्तिका, उत्तर भारत और दक्षिण भारत के मध्य का सेतु था। पवित्र शिप्रा के तट पर बसी भगवान महाकाल की यह नगरी युगों से धार्मिक आस्था, संस्कृति, ज्ञान और विज्ञान का केंद्र थी। इसके अतिरिक्त शक्तिपीठ माँ हरसिद्धि का स्थान और महाकाली का जाग्रत स्थान गढ़कालिका इस नगरी को अभूतपूर्व धार्मिक केंद्र बनाते थे। इस प्राचीन नगरी के नरपति थे मालवनरेश महाराज वीर विक्रमादित्य, और वह अश्वारोही कोई और नहीं वरन महाराज के नवरत्नों में से एक, गुप्तचर संस्था का...

जौन एलिया- मैं शायर बदनाम

#सरकार_जौन #श्रद्धांजलि जौन होना कोई मज़ाक नहीं....यूँ तो सरकार जौन को कोई क्या सुनाएगा, लेकिन पेश-ए-खिदमत है उनकी ये ग़ज़ल...जो उनकी तबीयत को बयां करती है। __________________________________________ एक हुनर है जो कर गया हूँ मैं सब के दिल से उतर गया हूँ मैं कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँ सुन रहा हूँ कि घर गया हूँ मैं क्या बताऊँ कि मर नहीं पाता जीते जी जब से मर गया हूँ मैं अब है बस अपना सामना दरपेश हर किसी हद से गुज़र गया हूँ मैं वो ही नाज़-ओ-अदा, वो ही ग़मज़े सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का कि यहाँ सब के सर गया हूँ मैं कभी खुद तक पहुँच नहीं पाया जब कि वाँ उम्र भर गया हूँ मैं तुम से जानां मिला हूँ जिस दिन से बे-तरह, खुद से डर गया हूँ मैं कू–ए–जानां में सोग बरपा है कि अचानक, सुधर गया हूँ मैं - "जौन एलिया" *************** " मैं जो हूं जौन एलिया हूँ जनाब, इसका बेहद लिहाज़ कीजिएगा" जौन एलिया, इस नाम का लिहाज़ तो आज पूरी दुनियाँ करती है, शायद सरकार जौन को भी इसका अंदाजा न रहा होगा या कि इस की हसरत न रही होगी। 14 दि...

खानाबदोश दिल

ख़ानाबदोश दिल _____________ ग़ुम हैं कई रोज़ से..... वो धीमी धड़कनें वो रिश्तों की तल्ख़ियाँ टूटी इमारतें उम्मीद की वादों के इम्तेहाँ वो नापे हुए रास्ते वो तन्हाँ सा कारवाँ है बहुत कुछ पास है जबसे … ज़िंदा रहने की इक ज़िद और दिल की ख़ानाबदोशियाँ बेपनाह सी उम्मीदें और मोहब्बत की सरगोशियाँ #दिल_मुन्तज़िर_सा NeeRaj K. Gupta

प्रेमरंग

सुनो जिंदगी! अपनी तूफानी रफ्तार को थाम कर कुछ पल जो रुको, थमो और ठहरो तो तुमसे कुछ बात करनी है कुछ अपनी कहनी है कुछ तुम्हारी सुननी है। तुम तो अल्हड़ नदिया की धारा सी बहती हो मैं संजीदा सा शायर तुम्हारी चाल से ताल नहीं मिला पाता शायद उम्र बढ़ रही है या सोचता ज्यादा हूँ आजकल एक गुज़ारिश करूँ तो क्या मानोगी? हो सके तो थोड़ी सुस्त हो जाओ, हो सके तो थोड़ा धीमे चलो मैं नहीं कर पाता तो तुम्हीं मेरी चाल से ताल मिला लो जिस दिन कर पाओगी ऐसा जीवन के "सुर" बज उठेंगे और उनसे संगीत का जो निर्झर फूटेगा... वो तुम्हें भी भिगो देगा, उस एक रंग में जिसे सब "प्रेम-रंग" कहते हैं। NeeRaj K. Gupta
【कहानी उस दौर की】 ____________________ ये कहानी है उस दौर की.. जब कॉलेज में दो कंपनियां आके चली गयीं थी... और मेरा प्लेसमेंट अभी नहीं हुआ था हौसला बढ़ाने के लिए घर पर माँ थी .. और महीने में एक बार फोन करके पैसे हैं कि नहीं पूछने वाले पिताजी भी.. पर मैं उन्हें अपनी मनोदशा बताना नहीं चाहता था .. हाँ एक और भी तो थी मेरे पास.. जो सब जानती थी . जो हिस्सा रही है इस सफर का.. 2004 से 2008 तक.. कहानी अब 2005 में हैं.. जब इंजीनियरिंग कॉलेज में एक साल पूरा हो चुका था.. और तमाम रैगिंग और शुरूआती इंटेरक्शंस के बावजूद.. मैं किसी से भी ज्यादा घुल मिल नहीं पाया था.. वो थी मेरे ही आस पास. कई बार बुक बैंक में नज़रें मिली.. कई बार एक ही टेबल पर आमने सामने पढ़े.. नेस्कैफे पर एक ही ग्रुप में खड़े हो कॉफी पी थी.. पर मैं सिर्फ उसका नाम ही जान पाया था.. और ये भी श्योर नहीं था ..कि वो भी मुझे नाम से जानती है क्या.... मुझे याद है... मेरी और उसकी बॉन्डिंग पहली बार.. एनुअल कॉलेज फेस्ट में हुई थी.. जब हम दोनों ही नीली जीन्स और ग्रे टी शर्ट में कॉलेज आये थे.. और कॉलेज रॉक बैंड के परफॉर्म क...
अधूरा बंदिशें उछाली हैं फिर बड़ी तबियत और बेपनाह रफ़्तार में ख़ुदा तक पहुँचेगीं तो कुबूल होंगी वरना पार चली जायेंगी उस के बाद भी मुक़म्मल रहीं तो मुझ तक लौटेंगी फ़िर शायद पूरे होंगे अधूरे राब्ते और अटके मिसरे... यूँ तो पूरा कुछ भी नहीं इस जमाने मे लेकिन अधूरा भी कहाँ कोई होता है यकीन न आये तो किसी को अधूरा कह के देखो! NeeRaj K. Gupta