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फिर तुम आओ न !

【फिर तुम आओ न】 इस आशा में कि तुम आओगे, इक लहर बनकर जिंदगी में फिर से मैंने साहिलों पर प्यास रखी है... और दिल को दरिया में डुबो दिया है। रात को चाँद अब भी निकलता है पर अब ठण्ड की लिहाफ में ढँका हुआ बीमार और कांपता सा मेरी तरह शायद वो भी तन्हा होगा उसकी भी चाँदनी रूठ गयी होगी उससे... तुमने जो रूमाल रख छोड़ा था सिरहाने वो आज भी मैंने सम्हाल कर रखा है उसमें आज भी तुम्हारी खुशबू आती है और तुम्हारे होने का अहसास मिलता है... तुम्हारे जाने के बाद साथ छोड़ दिया खुशियों ने जीने की चाहत ने, हर एक उम्मीद ने देह की ये पैहरन भी पुरानी हो चली है साँसें भी अब मेरा साथ नहीं देतीं.. आँखों में तुम्हारी ही तस्वीर बसा रखी है इसीलिए कोरें अक़्सर गीली हो जाती हैं मेरे जाने से पहले तो इक बार चली आओ क्या पता फ़िर से इक बार जी जाऊँ मैं..... NeeRaj K. Gupta