जौन एलिया- मैं शायर बदनाम
#सरकार_जौन
#श्रद्धांजलि
जौन होना कोई मज़ाक नहीं....यूँ तो सरकार जौन को कोई क्या सुनाएगा, लेकिन पेश-ए-खिदमत है उनकी ये ग़ज़ल...जो उनकी तबीयत को बयां करती है।
__________________________________________
एक हुनर है जो कर गया हूँ मैं
सब के दिल से उतर गया हूँ मैं
कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँ
सुन रहा हूँ कि घर गया हूँ मैं
क्या बताऊँ कि मर नहीं पाता
जीते जी जब से मर गया हूँ मैं
अब है बस अपना सामना दरपेश
हर किसी हद से गुज़र गया हूँ मैं
वो ही नाज़-ओ-अदा, वो ही ग़मज़े
सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं
अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का
कि यहाँ सब के सर गया हूँ मैं
कभी खुद तक पहुँच नहीं पाया
जब कि वाँ उम्र भर गया हूँ मैं
तुम से जानां मिला हूँ जिस दिन से
बे-तरह, खुद से डर गया हूँ मैं
कू–ए–जानां में सोग बरपा है
कि अचानक, सुधर गया हूँ मैं
- "जौन एलिया"
***************
" मैं जो हूं जौन एलिया हूँ जनाब,
इसका बेहद लिहाज़ कीजिएगा"
जौन एलिया, इस नाम का लिहाज़ तो आज पूरी दुनियाँ करती है, शायद सरकार जौन को भी इसका अंदाजा न रहा होगा या कि इस की हसरत न रही होगी।
14 दिसंबर 1931 को जौन साहेब उत्तर प्रदेश के अमरोहे में पैदा हुए थे। आम और रोहू मछली के लिए ख़्यात ये जिला फिर कमाल अमरोही और सरकार जौन के लिए जाना जाता है। पिता अल्लामा शफीक हसन एलिया जाने-माने विद्वान और शायर थे। पाँच भाइयों में सबसे छोटे जौन एलिया ने 8 साल की उम्र में पहला शेर कहा।
उन्हें अपने मुल्क भारत से बेपनाह मोहब्बत थी मगर बंटवारे की तलवार जब चली तो ना चाहते हुए भी 10 साल बाद उनको पाकिस्तान के कराची मे जाकर बसना पड़ा। वहाँ उनको "जाहिदा हिना" से इश्क हुआ, और फिर शादी भी हुई, मगर उनका यह रिश्ता कायम न रह सका और तीन बच्चों के बाद जल्द ही तलाक़ हो गया। इसकी वजह जौन साहब तमाम उम्र खुद को ही समझते रहे। खफा मिजाज के जौन शराब और गम में डूब गए। शायरी से लेकर जिंदगी तक में खुद को बर्बाद करने की बात करने लगे।
"अपनी शायरी का जितना मुंकिर* मैं हूं, उतना मुंकिर मेरा कोई बदतरीन दुश्मन भी न होगा। कभी कभी तो मुझे अपनी शायरी बेहद बुरी, बेतुकी सी लगती है। इसलिए अब तक मेरा कोई मज्मुआ शाये नहीं हुआ और जब तक खुदा ही शाये नहीं कराएगा, उस वक्त तक शाये होगा भी नहीं."
*मुंकिर: खारिज करने वाला
‘यानी, गुमान, लेकिन, गोया’ किताबें छपीं, हाथों हाथ बिकीं भी, लेकिन खुद को जिंदगी में नाकामयाब समझने वाले सरकार जौन 8 नवंबर 2002 को इस दुनिया से विदा हुए, मगर उनके शेरों के ज़रिए वो हमारे दिल और दिमाग मे बस गए।
"मैं भी बहुत अजीब हूं, इतना अजीब हूं कि बस
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं"
अाज जौन साहब की बरसी पर उन्हें सज़दा करते हुए बस एक ही बात निकलती है:~
जौन अब भी जिन्दा हैं हमारे ही अक्स में
क्यूँ कि जौन होना आज भी कोई मज़ाक नहीं है
****************
सरकार जौन की यादों में उनके ही कुछ बेहतरीन शेर.....
मैं भी बहुत अजीब हूं, इतना अजीब हूं कि बस
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं
जो गुज़ारी न जा सकी हम से
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है
कौन इस घर की देख-भाल करे
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है
यूं जो तकता है आसमान को तू
कोई रहता है आसमान में क्या
कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे
जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे
मैं भी बहुत अजीब हूं इतना अजीब हूं कि बस
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं
मैं रहा उम्र भर जुदा ख़ुद से
याद मैं ख़ुद को उम्र भर आया
क्या बताऊं के मर नहीं पाता
जीते जी जब से मर गया हूं मैं
रोया हूं तो अपने दोस्तों में
पर तुझ से तो हंस के ही मिला हूं
हो रहा हूं मैं किस तरह बर्बाद
देखने वाले हाथ मलते हैं
ख़ूब है शौक़ का ये पहलू भी
मैं भी बर्बाद हो गया तू भी
उस गली ने ये सुन के सब्र किया
जाने वाले यहां के थे ही नहीं
अपना ख़ाका लगता हूं
एक तमाशा लगता हूं
सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई
क्यूं चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई
ख़ूब है इश्क़ का ये पहलू भी
मैं भी बर्बाद हो गया तू भी
NeeRaj K. Gupta
#श्रद्धांजलि
जौन होना कोई मज़ाक नहीं....यूँ तो सरकार जौन को कोई क्या सुनाएगा, लेकिन पेश-ए-खिदमत है उनकी ये ग़ज़ल...जो उनकी तबीयत को बयां करती है।
__________________________________________
एक हुनर है जो कर गया हूँ मैं
सब के दिल से उतर गया हूँ मैं
कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँ
सुन रहा हूँ कि घर गया हूँ मैं
क्या बताऊँ कि मर नहीं पाता
जीते जी जब से मर गया हूँ मैं
अब है बस अपना सामना दरपेश
हर किसी हद से गुज़र गया हूँ मैं
वो ही नाज़-ओ-अदा, वो ही ग़मज़े
सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं
अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का
कि यहाँ सब के सर गया हूँ मैं
कभी खुद तक पहुँच नहीं पाया
जब कि वाँ उम्र भर गया हूँ मैं
तुम से जानां मिला हूँ जिस दिन से
बे-तरह, खुद से डर गया हूँ मैं
कू–ए–जानां में सोग बरपा है
कि अचानक, सुधर गया हूँ मैं
- "जौन एलिया"
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" मैं जो हूं जौन एलिया हूँ जनाब,
इसका बेहद लिहाज़ कीजिएगा"
जौन एलिया, इस नाम का लिहाज़ तो आज पूरी दुनियाँ करती है, शायद सरकार जौन को भी इसका अंदाजा न रहा होगा या कि इस की हसरत न रही होगी।
14 दिसंबर 1931 को जौन साहेब उत्तर प्रदेश के अमरोहे में पैदा हुए थे। आम और रोहू मछली के लिए ख़्यात ये जिला फिर कमाल अमरोही और सरकार जौन के लिए जाना जाता है। पिता अल्लामा शफीक हसन एलिया जाने-माने विद्वान और शायर थे। पाँच भाइयों में सबसे छोटे जौन एलिया ने 8 साल की उम्र में पहला शेर कहा।
उन्हें अपने मुल्क भारत से बेपनाह मोहब्बत थी मगर बंटवारे की तलवार जब चली तो ना चाहते हुए भी 10 साल बाद उनको पाकिस्तान के कराची मे जाकर बसना पड़ा। वहाँ उनको "जाहिदा हिना" से इश्क हुआ, और फिर शादी भी हुई, मगर उनका यह रिश्ता कायम न रह सका और तीन बच्चों के बाद जल्द ही तलाक़ हो गया। इसकी वजह जौन साहब तमाम उम्र खुद को ही समझते रहे। खफा मिजाज के जौन शराब और गम में डूब गए। शायरी से लेकर जिंदगी तक में खुद को बर्बाद करने की बात करने लगे।
"अपनी शायरी का जितना मुंकिर* मैं हूं, उतना मुंकिर मेरा कोई बदतरीन दुश्मन भी न होगा। कभी कभी तो मुझे अपनी शायरी बेहद बुरी, बेतुकी सी लगती है। इसलिए अब तक मेरा कोई मज्मुआ शाये नहीं हुआ और जब तक खुदा ही शाये नहीं कराएगा, उस वक्त तक शाये होगा भी नहीं."
*मुंकिर: खारिज करने वाला
‘यानी, गुमान, लेकिन, गोया’ किताबें छपीं, हाथों हाथ बिकीं भी, लेकिन खुद को जिंदगी में नाकामयाब समझने वाले सरकार जौन 8 नवंबर 2002 को इस दुनिया से विदा हुए, मगर उनके शेरों के ज़रिए वो हमारे दिल और दिमाग मे बस गए।
"मैं भी बहुत अजीब हूं, इतना अजीब हूं कि बस
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं"
अाज जौन साहब की बरसी पर उन्हें सज़दा करते हुए बस एक ही बात निकलती है:~
जौन अब भी जिन्दा हैं हमारे ही अक्स में
क्यूँ कि जौन होना आज भी कोई मज़ाक नहीं है
****************
सरकार जौन की यादों में उनके ही कुछ बेहतरीन शेर.....
मैं भी बहुत अजीब हूं, इतना अजीब हूं कि बस
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं
जो गुज़ारी न जा सकी हम से
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है
कौन इस घर की देख-भाल करे
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है
यूं जो तकता है आसमान को तू
कोई रहता है आसमान में क्या
कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे
जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे
मैं भी बहुत अजीब हूं इतना अजीब हूं कि बस
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं
मैं रहा उम्र भर जुदा ख़ुद से
याद मैं ख़ुद को उम्र भर आया
क्या बताऊं के मर नहीं पाता
जीते जी जब से मर गया हूं मैं
रोया हूं तो अपने दोस्तों में
पर तुझ से तो हंस के ही मिला हूं
हो रहा हूं मैं किस तरह बर्बाद
देखने वाले हाथ मलते हैं
ख़ूब है शौक़ का ये पहलू भी
मैं भी बर्बाद हो गया तू भी
उस गली ने ये सुन के सब्र किया
जाने वाले यहां के थे ही नहीं
अपना ख़ाका लगता हूं
एक तमाशा लगता हूं
सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई
क्यूं चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई
ख़ूब है इश्क़ का ये पहलू भी
मैं भी बर्बाद हो गया तू भी
NeeRaj K. Gupta
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