सड़क
【सड़क】
___________
एक हाईवे हमें भी पिघलाता है जर्रा जर्रा ...
इससे तो बेहतर होता कि हम एक दूसरे से हजारों मील दूर रहते। ऐसे में कम से कम झूठी उम्मीदें तो नहीं पनपतीं, हर बारिश के बाद तुमको देखने की ख्वाहिश तो नहीं होती। ऊपर वाला बड़ा बेरहम स्क्रिप्ट राइटर है। वो जब किरदार रचता है तो मिटटी में बेचैनी गूंथ देता है और मुझ जैसे लोगों को फिर कभी करार नहीं आता....
इस कहानी के किरदार एक दूसरे से 150 किलोमीटर दूर रहते हैं। एक बार तो सोचता हूँ कहानी में किसी यूरोप के शहरों की सेटिंग दे दूँ। वहाँ शहर इतने खूबसूरत होते हैं कि पूछो मत, बरसातों और सर्दियों में खास तौर पर; लेकिन उस सेटिंग में मेरे किरदार नैचुरल नहीं महसूस करेंगे। उनके अहसासों में एक अजनबियत आ जायेगी। यूँ तो मुझे 'वियेना' और 'बर्न' बहुत पसंद है, पर उनकी बात फिर कभी...
अपनी कहानी के किरदारों की बात करता हूँ ।
उन दोनों के शहरों के बीच हर तरह की कनेक्टिविटी है । बसें चलती है, प्राइवेट टैक्सी है, ट्रेन है, और उन्हें जोड़ने वाला हाइवे देश का सबसे खूबसूरत रास्ता माना जाता है। वो रहती है देश के सबसे साफ़-सुथरे सपनों के शहर चंडीगढ़ में और लड़का रहता है दानवीर कर्ण की नगरी करनाल में ।
कुछ तसवीरें हैं ज़हन में...
किसी सुडोकु पजल जैसी थी लड़की, सारे खानों में सही नंबर रखने होते थे जब जा कर उसके होने में कोई तारतम्य महसूस होता था वरना वो बेहद रैंडम थी और जैसा कि मेरी कहानी के लड़के के साथ होता है,उसे उसके नंबरों से डर लगता था । वो उसे सुलझाना चाहता था मगर डरता था । हालात हर बार ऐसे होते थे कि वो मिलते मिलते रह जाते थे । वे सबसे ज्यादा सपनों में मिलते थे, जिस दिन किस्मत अच्छी होती थी लड़के के पास पूरे 8 घंटे होते थे ,वर्ना तो नींदें हराम थी ही ।
लड़की उसकी बड़ी जिद पर दूध या जूस पीती थी, लड़के ने उसके होठों का स्वाद चखने के लिए उसके गिलास से एक घूँट भर ली थी, मगर उसने लड़की से इतना ही कहा कि मुझे देखना था तुम ये पीने से डरती क्यों हो? लड़के को तब ब्लैक कॉफ़ी पसंद थी, विदाउट मिल्क, विदाउट शुगर!
आजकल लड़का वो कॉफ़ी मग अपनी खिड़की पर रख देता है और डूब जाता है किसी गहरी सोच की नदी में....
दोनों शहर इतने पास थे फिर भी कितनी दूर थे...
और ये ऐसी तकलीफ थी कि लड़के को आज भी साँस लेने नहीं देती। उन दिनों में लड़का सोचता कि ऐसे मौसम में क्या ये मुमकिन है कि लड़की वाकई आ सके या वो लड़का खुद जाकर लड़की से मिल सके ? दो या तीन घंटे क्या होते हैं आखिर ? वो छत के कोने वाले गुलमोहर के नीचे खड़ा दिसम्बर-जनवरी की ओस में भीगता, फोन पर बातें करता और जब अकेला होता तो सोचता कि धुंध में तेज़ ड्राइव करना जितना खतरनाक है उतना ही खूबसूरत भी है या कहें कि खतरनाक है इसलिए खूबसूरत भी...
इतनी दूरी कि जब चाहो उससे मिलने जा सको लेकिन उतना सा वक़्त भी न मिले कभी तो ये धीमे जहर से मरने जैसा होता है। फिर भी कभी-कभी लड़के के हिस्से में कोई बारिश आ जाती है जब दो पल लड़की ऑफिस के काम से फुर्सत निकालकर उसकी कॉल को उठा लेती है या कोई msg पढ़ लेती है या कैफे में बैठे, अपने-अपने पसंद की कॉफ़ी पीते हुए वे दोनों सोचते है कि जिंदगी तब कितनी अच्छी थी जब एक दूसरे से प्यार नहीं हुआ था। काश कि वे दोनों बहुत दूर के शहर में रहते जहाँ से आने की उम्मीद न होती, या कि एक दूसरे को सरप्राईज देने के बजाये वे प्लान कर के एक दूसरे के शहर आते...
लड़के को याद आती है कुछ पुरानी बातें ..
वे अक्सर टहलने निकल जाया करते थे, घुमावदार सड़कों पर और बैठते थे मंदिर की सीढ़ियों पर, शीशम के ऊंचे पेड़ों वाले रस्ते पर...
लड़का बाएं हाथ में घड़ी बांधता था और लड़की दायें में हाथ में पहनती थी उसका दिया कोई कंगन..
इस कहानी में बहुत सारा इंतज़ार है...
उन दो शहरों की तरह जो अपनी सारी बातें सिर्फ उनको जोड़ने वाले हाईवे के माध्यम से कर पाते है । कहानियों को फुर्सत होती है कि वे जहाँ से ख़त्म हों, वहां से फिर नयी शुरुआत कर सकें।
मैं उन्हें इसी मोड़ पर छोड़ देता हूँ...
जहाँ प्यार है और इंतज़ार है बेहद इंतज़ार...
उम्मीद नहीं है क्योंकि ख्वाहिश नहीं है दोनों को दोनों की अब शायद !
दोनों अपने अपने शहरों से भी उतना ही प्यार करते हैं जितना कि एक दूसरे से ।
बेचैनी के इस आलम में सुकून बस इतना है कि दोनों जानते हैं कि हर बारिश में और सर्दियों की इस धुंध में यहाँ से कुछ दूर के शहर में रहने वाला कोई उनसे प्यार करता है और चाहता है कि वो एक्सप्रेसवे पर 150 की स्पीड से गाड़ी उड़ाता हुआ उनके पास चला आये । जीने के लिए इतना काफी है...
मगर फिर भी लड़का पागल है ...चाहता है कि एक बार लड़की सब काम धाम और दुनियादारी छोड़ कर उसके गले से लिपट जाए और कह दे कि कमबख्त तुम्हारा इश्क मेरी जान के साथ ही जायेगा....
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ये कहानी है दो ऐसे दीवानों की जिनका दिल आज भी एक दूसरे के लिए ही धड़कता है, ये कहानी आज भी उतनी ही ताज़ा है जितनी कि तब थी जब 10 बरस पहले जियी जा रही थी...ये आप पर है कि आप इसे कितना सच्चा और कितना काल्पनिक मानते हैं।
NeeRaj K. Gupta
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एक हाईवे हमें भी पिघलाता है जर्रा जर्रा ...
इससे तो बेहतर होता कि हम एक दूसरे से हजारों मील दूर रहते। ऐसे में कम से कम झूठी उम्मीदें तो नहीं पनपतीं, हर बारिश के बाद तुमको देखने की ख्वाहिश तो नहीं होती। ऊपर वाला बड़ा बेरहम स्क्रिप्ट राइटर है। वो जब किरदार रचता है तो मिटटी में बेचैनी गूंथ देता है और मुझ जैसे लोगों को फिर कभी करार नहीं आता....
इस कहानी के किरदार एक दूसरे से 150 किलोमीटर दूर रहते हैं। एक बार तो सोचता हूँ कहानी में किसी यूरोप के शहरों की सेटिंग दे दूँ। वहाँ शहर इतने खूबसूरत होते हैं कि पूछो मत, बरसातों और सर्दियों में खास तौर पर; लेकिन उस सेटिंग में मेरे किरदार नैचुरल नहीं महसूस करेंगे। उनके अहसासों में एक अजनबियत आ जायेगी। यूँ तो मुझे 'वियेना' और 'बर्न' बहुत पसंद है, पर उनकी बात फिर कभी...
अपनी कहानी के किरदारों की बात करता हूँ ।
उन दोनों के शहरों के बीच हर तरह की कनेक्टिविटी है । बसें चलती है, प्राइवेट टैक्सी है, ट्रेन है, और उन्हें जोड़ने वाला हाइवे देश का सबसे खूबसूरत रास्ता माना जाता है। वो रहती है देश के सबसे साफ़-सुथरे सपनों के शहर चंडीगढ़ में और लड़का रहता है दानवीर कर्ण की नगरी करनाल में ।
कुछ तसवीरें हैं ज़हन में...
किसी सुडोकु पजल जैसी थी लड़की, सारे खानों में सही नंबर रखने होते थे जब जा कर उसके होने में कोई तारतम्य महसूस होता था वरना वो बेहद रैंडम थी और जैसा कि मेरी कहानी के लड़के के साथ होता है,उसे उसके नंबरों से डर लगता था । वो उसे सुलझाना चाहता था मगर डरता था । हालात हर बार ऐसे होते थे कि वो मिलते मिलते रह जाते थे । वे सबसे ज्यादा सपनों में मिलते थे, जिस दिन किस्मत अच्छी होती थी लड़के के पास पूरे 8 घंटे होते थे ,वर्ना तो नींदें हराम थी ही ।
लड़की उसकी बड़ी जिद पर दूध या जूस पीती थी, लड़के ने उसके होठों का स्वाद चखने के लिए उसके गिलास से एक घूँट भर ली थी, मगर उसने लड़की से इतना ही कहा कि मुझे देखना था तुम ये पीने से डरती क्यों हो? लड़के को तब ब्लैक कॉफ़ी पसंद थी, विदाउट मिल्क, विदाउट शुगर!
आजकल लड़का वो कॉफ़ी मग अपनी खिड़की पर रख देता है और डूब जाता है किसी गहरी सोच की नदी में....
दोनों शहर इतने पास थे फिर भी कितनी दूर थे...
और ये ऐसी तकलीफ थी कि लड़के को आज भी साँस लेने नहीं देती। उन दिनों में लड़का सोचता कि ऐसे मौसम में क्या ये मुमकिन है कि लड़की वाकई आ सके या वो लड़का खुद जाकर लड़की से मिल सके ? दो या तीन घंटे क्या होते हैं आखिर ? वो छत के कोने वाले गुलमोहर के नीचे खड़ा दिसम्बर-जनवरी की ओस में भीगता, फोन पर बातें करता और जब अकेला होता तो सोचता कि धुंध में तेज़ ड्राइव करना जितना खतरनाक है उतना ही खूबसूरत भी है या कहें कि खतरनाक है इसलिए खूबसूरत भी...
इतनी दूरी कि जब चाहो उससे मिलने जा सको लेकिन उतना सा वक़्त भी न मिले कभी तो ये धीमे जहर से मरने जैसा होता है। फिर भी कभी-कभी लड़के के हिस्से में कोई बारिश आ जाती है जब दो पल लड़की ऑफिस के काम से फुर्सत निकालकर उसकी कॉल को उठा लेती है या कोई msg पढ़ लेती है या कैफे में बैठे, अपने-अपने पसंद की कॉफ़ी पीते हुए वे दोनों सोचते है कि जिंदगी तब कितनी अच्छी थी जब एक दूसरे से प्यार नहीं हुआ था। काश कि वे दोनों बहुत दूर के शहर में रहते जहाँ से आने की उम्मीद न होती, या कि एक दूसरे को सरप्राईज देने के बजाये वे प्लान कर के एक दूसरे के शहर आते...
लड़के को याद आती है कुछ पुरानी बातें ..
वे अक्सर टहलने निकल जाया करते थे, घुमावदार सड़कों पर और बैठते थे मंदिर की सीढ़ियों पर, शीशम के ऊंचे पेड़ों वाले रस्ते पर...
लड़का बाएं हाथ में घड़ी बांधता था और लड़की दायें में हाथ में पहनती थी उसका दिया कोई कंगन..
इस कहानी में बहुत सारा इंतज़ार है...
उन दो शहरों की तरह जो अपनी सारी बातें सिर्फ उनको जोड़ने वाले हाईवे के माध्यम से कर पाते है । कहानियों को फुर्सत होती है कि वे जहाँ से ख़त्म हों, वहां से फिर नयी शुरुआत कर सकें।
मैं उन्हें इसी मोड़ पर छोड़ देता हूँ...
जहाँ प्यार है और इंतज़ार है बेहद इंतज़ार...
उम्मीद नहीं है क्योंकि ख्वाहिश नहीं है दोनों को दोनों की अब शायद !
दोनों अपने अपने शहरों से भी उतना ही प्यार करते हैं जितना कि एक दूसरे से ।
बेचैनी के इस आलम में सुकून बस इतना है कि दोनों जानते हैं कि हर बारिश में और सर्दियों की इस धुंध में यहाँ से कुछ दूर के शहर में रहने वाला कोई उनसे प्यार करता है और चाहता है कि वो एक्सप्रेसवे पर 150 की स्पीड से गाड़ी उड़ाता हुआ उनके पास चला आये । जीने के लिए इतना काफी है...
मगर फिर भी लड़का पागल है ...चाहता है कि एक बार लड़की सब काम धाम और दुनियादारी छोड़ कर उसके गले से लिपट जाए और कह दे कि कमबख्त तुम्हारा इश्क मेरी जान के साथ ही जायेगा....
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ये कहानी है दो ऐसे दीवानों की जिनका दिल आज भी एक दूसरे के लिए ही धड़कता है, ये कहानी आज भी उतनी ही ताज़ा है जितनी कि तब थी जब 10 बरस पहले जियी जा रही थी...ये आप पर है कि आप इसे कितना सच्चा और कितना काल्पनिक मानते हैं।
NeeRaj K. Gupta
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