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Showing posts from October, 2018

मुन्तज़िर

दिल हथेली पर रखने का शायद बस इतना ये हुआ असर है, कि हर ख़्वाब मेरे आँखों का  आज हूबहू कागज पर है मेरी आरजू न थी  जिस गुलशन की रानाईयों को वहाँ चर्चे मेरी आज तक भी होते हैं मेरी हर फ़तह और शिकस्त के पीछे जिस शख्स का इल्हाम हुआ करता था मेरी ये नज़रें आज तक ढूँढती हैं उसको मेरा दिल कल भी बस मुन्तज़िर था मेरा दिल आज भी बस मुन्तज़िर ही है इक अधूरे इश्क़ की सदा आती है जिसकी आवाज मैं दिल की धड़कनों में सुनता हूँ अधूरे राब्ते थे कुछ जिनको कागजों पर लिख लेता हूँ वक्त की स्याही लेकिन उन्हें पूरा होने नहीं देती जाने कौन सी खता की ये उकूबत है कि आँखों की दवात अश्कों की स्याही बरसाती है और मेरे नज़्मों के हर अल्फ़ाज़ डूब जाते हैं सोचता हूँ ऐसे हालात में जाने  कब मुक़म्मल होगी ये अल्फाजों की किताब NeeRaj K. Gupta

पूरे इश्क़ की अधूरी कहानी

"जयपुर की हवाओं में इश्क़ घुला है, सबकुछ तो जाना पहचाना सा ही है।" बड़े चौपड़ चौराहे से गुजरते रोहन ने सोचा। आज 8 साल बाद जयपुर आया था। रोहन, एक मल्टीनेशनल कम्पनी का सीनियर मैनेजर था और कम्पनी के ब्रांड प्रमोशन के सिलसिले में जयपुर एक सेमिनार अटेंड करने आया था। वो खो गया आठ साल पहले की यादों में जब वो अपनी पहली नौकरी के चलते जयपुर आया था और बारिश की पहली फुहार ने उसका स्वागत किया था। इंटरव्यू 10 बजे से था और वहीं तो पहली बार मिली थी 'वो'। सुर्ख होंठ, बड़ी-बड़ी आँखें, झक दूधिया गोरा रंग और कोयल सी पतली आवाज, कुल मिला कर एक आकर्षक व्यक्तित्व जिसमें रोहन खो गया था। उसी ने तो उसका ध्यान तोड़ा था, "हेलो! आपका नाम पुकारा जा रहा है, जाइये।" "आपको कैसे पता मेरा नाम?" हकलाते हुए रोहन बोला "वो आपकी फाइल पर लिखा है न, वहीं से देखा" "ओह! यू आर टू स्मार्ट" "नहीं, नहीं...बस यूं ही" उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया दिल तो किया कि वो भी 'उसका' नाम पूछे पर हिम्मत नहीं हुई। फ़िलहाल इंटरव्यू में रोहन सफल हुआ और उसको दो दिन ...