ख़्वाब और उजाला

#ख़्वाब_और_उजाला

खुली आँखों से एक ख्वाब पढ़ रहा था उस रोज़,
दिलचस्प सा ख्वाब था वो,
हर एक हर्फ ख़याल की गाढ़ी स्याही में लिखा
उजालों का भी शोर बहुत था उस रोज़,
मैं ख़्वाब में डूबा हुआ यूँ तो बेख़बर था;
मगर किसी एक आवाज़ ने पुकारा था मुझे......

रोशनी के भरम और ख़यालों की हक़ीक़त में
फ़र्क नहीं कर पाया मैं शायद
अपनी नींद का एक सिरा
ख़्वाब के पन्नों के बीच दबाकर
उस आवाज़ को ढूँढता रहा हूँ मैं अब तक
शोर आज भी बहुत होता है इन उजालों  में
कई आवाजें बहुत सी मिलती जुलती हैं उस आवाज़ से...

मगर मैं जानता हूँ;
वो आवाज़ उसी ख्वाब से आई थी
नींद का वो सिरा हटाकर
फिर वही ख़्वाब टटोलने की कोशिश करता हूँ हर रात
मगर वो आख़िरी हर्फ़ जो पढ़ा था
उससे आगे जाया नहीं जाता मुझसे
मुझे उस ख़्वाब की हक़ीक़त में ही रहना था;
उजाले अक्सर दगा किया करते हैं.....

NeeRaj K. Gupta

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