【शापित】 आज शिव-मंदिर में शिव के सामने आँख मूंदे बैठे उसके मन में भयानक बवंडर चल रहा था। बीते दिनों की घटनाओं से वो व्यग्र था और सभी भावनाएं उसके चेहरे पर आ-जा रही थीं। अचानक उसने आँखें खोलीं और नेत्रों से बहते लोर को बह जाने दिया। डबडबाई आँखों और रुंधे गले से बोल उठा वो, "महादेव, नियति आज मुझे पुनः उसी जगह ले आई है जहाँ सब कुछ समाप्त हुआ था, आप तो साक्षी हैं न समस्त घटनाओं के.....आप ही बताइए कि हमारा दोष आखिर क्या था?? अपनी जन्मभूमि, पहचान, नाम, वर्ण और धर्म सभी का त्याग कर हम क्यों वन-वन भटके? 20 वर्ष! हाँ, जीवन के बीस वर्ष बिताए हैं मैंने हिमालय की उपत्यकाओं में, विन्ध्य की गिरि-कंदराओं में और गोदावरी के किनारे वृक्षों के नीचे....कितने ही प्रयास किये लेकिन सभी विफल, क्यों महादेव? आखिर क्यों?" यह कहते हुए उसके हृदय की पीड़ा उसके चेहरे पर उभर आई थी और सहसा उसने पात्र में रखा हुआ भस्म अपने चेहरे पर मला और मन्दिर से निकल कर पर्वत पर ऊपर बढ़ने लगा। ----------------------------- नर्मदा का तट, नर्मदा का जल आज हमेशा से शांत था। दो गौरवर्णी साधुवेषी व्यक्ति तट पर बैठे बाते...
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