अधूरा

बंदिशें उछाली हैं फिर बड़ी तबियत और बेपनाह रफ़्तार में
ख़ुदा तक पहुँचेगीं तो कुबूल होंगी वरना पार चली जायेंगी

उस के बाद भी मुक़म्मल रहीं तो मुझ तक लौटेंगी
फ़िर शायद पूरे होंगे अधूरे राब्ते और अटके मिसरे...
यूँ तो पूरा कुछ भी नहीं इस जमाने मे
लेकिन अधूरा भी कहाँ कोई होता है
यकीन न आये तो किसी को अधूरा कह के देखो!

NeeRaj K. Gupta


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