प्रेमरंग
सुनो जिंदगी!
अपनी तूफानी रफ्तार को थाम कर
कुछ पल जो रुको,
थमो और ठहरो
तो तुमसे कुछ बात करनी है
कुछ अपनी कहनी है
कुछ तुम्हारी सुननी है।
तुम तो अल्हड़ नदिया की धारा सी बहती हो
मैं संजीदा सा शायर
तुम्हारी चाल से ताल नहीं मिला पाता
शायद उम्र बढ़ रही है
या सोचता ज्यादा हूँ आजकल
एक गुज़ारिश करूँ तो क्या मानोगी?
हो सके तो थोड़ी सुस्त हो जाओ,
हो सके तो थोड़ा धीमे चलो
मैं नहीं कर पाता तो
तुम्हीं मेरी चाल से ताल मिला लो
जिस दिन कर पाओगी ऐसा
जीवन के "सुर" बज उठेंगे
और उनसे संगीत का जो निर्झर फूटेगा...
वो तुम्हें भी भिगो देगा,
उस एक रंग में
जिसे सब "प्रेम-रंग" कहते हैं।
NeeRaj K. Gupta
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