बेनाम शायर

हर रोज दिन होता है और ढलता है
हर रोज सुरमई सी शाम चली आती है
हर रोज ही रात होती है, मैं होता हूँ और होती हैं यादें
हर रोज कोई ख़याल भी जहन में आ ही जाता है

किसी-किसी रोज़ यूँ भी होता है
जब कि कोई ख़याल रंग देता है मन को
कई ख़यालों के रंग भी अलग होते हैं
इसलिए ये ख़याल भी टुकड़ों में आते हैं मुझ तक
मेरी रंगत का कोई टुकड़ा सम्हाल के रख लेता हूँ
फुरसत मिले तो जोड़ने बैठ जाता हूँ इनको

वैसे भी बेनाम सा शायर हूँ तलफ़्फ़ुज़ क्या जानूँ
इन ख़यालों के रंग कुछ अल्फ़ाज़ दे जाते हैं
मैं भी बस इक आस में ही रहता हूँ अक्सर
भूले से शायद कोई नज़्म बन ही जाये,

न बने तो ये ज़िंदगी तो आखिर है ही..

NeeRaj K. Gupta

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