【शापित】

आज शिव-मंदिर में शिव के सामने आँख मूंदे बैठे उसके मन में भयानक बवंडर चल रहा था। बीते दिनों की घटनाओं से वो व्यग्र था और सभी भावनाएं उसके चेहरे पर आ-जा रही थीं। अचानक उसने आँखें खोलीं और नेत्रों से बहते लोर को बह जाने दिया।

डबडबाई आँखों और रुंधे गले से बोल उठा वो, "महादेव, नियति आज मुझे पुनः उसी जगह ले आई है जहाँ सब कुछ समाप्त हुआ था, आप तो साक्षी हैं न समस्त घटनाओं के.....आप ही बताइए कि हमारा दोष आखिर क्या था?? अपनी जन्मभूमि, पहचान, नाम, वर्ण और धर्म सभी का त्याग कर हम क्यों वन-वन भटके?

20 वर्ष! हाँ, जीवन के बीस वर्ष बिताए हैं मैंने हिमालय की उपत्यकाओं में, विन्ध्य की गिरि-कंदराओं में और गोदावरी के किनारे वृक्षों के नीचे....कितने ही प्रयास किये लेकिन सभी विफल, क्यों महादेव? आखिर क्यों?"

यह कहते हुए उसके हृदय की पीड़ा उसके चेहरे पर उभर आई थी और सहसा उसने पात्र में रखा हुआ भस्म अपने चेहरे पर मला और मन्दिर से निकल कर पर्वत पर ऊपर बढ़ने लगा।
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नर्मदा का तट, नर्मदा का जल आज हमेशा से शांत था। दो गौरवर्णी साधुवेषी व्यक्ति तट पर बैठे बातें कर रहे थे। एक व्यक्ति तनिक उम्रदराज था जिसकी आयु लगभग ४५ वर्ष की रही होगी और दूसरा व्यक्ति युवा था जिसकी आयु २६ वर्ष की होगी। दोनों के शीश पर जटाएं थीं और युवा साधु मुक्तकेशी था।

"माधव, स्थिति सुखद नहीं कही जा सकती, हम अपने कर्तव्य कर रहे हैं किंतु पिनाकिनी से चलकर जब हम समूहबद्ध हुए थे तब से हमारे समूह के साथी कई दिशाओं में चलकर हमसे बिछड़ चुके हैं। हमें उन्हें ढूंढ कर संगठित करना होगा।"

"जी आचार्य! प्रयासों का वेग ही जीवन के उद्देश्यों को दिशा देता है, हम प्रयास कर रहे हैं, शेष जैसी महादेव की इच्छा"

"मुझे आश्रम के अन्य शिष्यों को भी इस महती कार्य में लगाना होगा, वर्तमान में इस क्षेत्र में हमारे साथ १००० से १२०० व्यक्ति तो होंगे ही! तुम युवाओं में से ४ अन्य श्रेष्ठ युवाओं का चयन करो और उत्तर दिशा में प्रस्थान करो, मैं स्वयं पूर्व दिशा में जाऊँगा। एक माह पश्चात हम काशी नगरी में मणिकर्णिका के महाश्मशान में मिलेंगे।"

"जो आज्ञा दादागुरु"

"जाओ वत्स! महादेव तुम्हारा पथ प्रशस्त करें।

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"इस वन्य प्रांत में हमारे शिविर के ४०० से अधिक युवाओं में से मात्र ४ युवाओं का चयन तनिक दुष्कर कार्य है, मुझे अपने बिछड़े स्वजनों को किसी भी मूल्य पर तलाशना है और उत्तर में हिमालय के उत्तुङ्ग शिखरों पर भी जाना हो सकता है। इसलिए मुझे इनका चयन अत्यंत सावधानी से करना होगा।" माधव सोचता हुआ आगे बढ़ रहा था।

"मुझे आवश्यकता होगी एक योद्धा की, एक कुशल पाककला विशेषज्ञ की, एक उत्तम पर्वतारोही की और एक वन्यजीवन के अभ्यस्त युवक की...शुरुआत करता हूँ आचार्य विप्लव के शिविर से, क्योंकि युवाओं को युद्ध का अभ्यास तो वो ही करवा रहे हैं"

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दूसरी ओर पर्वत पर चढ़ते हुए व्यक्ति के माथे पर स्वेद की  बूंदें उभर आईं थीं, आकाश में अंशुमालि अपनी पूर्ण प्रखरता से प्रकाशित थे, और स्वेद के कारण चेहरे पर लगा भस्म अब विकृत हो गया था। व्यक्ति ऊपर बनी एक कुटिया की ओर बढ़ रहा था। कुटिया के पास दो वृक्ष लगे थे और निकट ही एक छोटा सा सरोवर था जिसमे स्वच्छ जल हमेशा उपलब्ध था। कुटिया में एक स्थान विश्राम का था और एक छोटी सी रसोई भी थी। व्यक्ति उस कुटिया में पहुँच कर तीव्रता से, बिछी हुई कुश की चटाई को उठाता है और कुटिया की मिट्टी को खोदना प्रारम्भ कर देता है।

थोड़ी मिट्टी हटाने पर उसे एक पांडुलिपि मिलती है जिसे देखकर उसकी आँखों में चमक आ जाती है।

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आचार्य विप्लव का आश्रम, आश्रम में एक ओर एक पूजास्थल में भगवान नृसिंह की प्रतिमा है जिसपर पीला सिंदूर और पुष्प चढ़े हुए हैं और प्रतिमा के नीचे एक स्वर्ण-जड़ित कटार रखी हुई है।

"प्रणाम आचार्य"

"आओ माधव! कहो कैसे आना हुआ? मुझे दादागुरु ने योजना के विषय में बताया है, वे अभी उज्जयिनी की ओर प्रस्थान कर चुके हैं।"

" आचार्य, जब आपको योजना का ज्ञान है तो फिर मेरे आगमन का अभिप्राय आप अवश्य समझ गए होंगे। मुझे आपके सर्वश्रेष्ठ शिष्यों में से एक योद्धा की आवश्यकता है, एक ऐसा योद्धा जो मुझे पराजित कर सके"

"माधव! क्या यह शर्त अलभ्य नहीं है, वर्तमान युग में तुमसे उत्तम योद्धा वस्तुतः कोई नहीं है, तुम स्वयं ही महायोद्धा बोधिआदित्य के शिष्य हो तो तुम्हें पराजित कर सकने की क्षमता तो किसी युवा में नहीं है।"

"तो आचार्य...."

"निराश मत हो पुत्र, एक युवा है ऐसा जो तुम्हें परास्त तो नहीं कर सकता किन्तु वह तुम्हारे लक्ष्य पूर्ति में सहायक होने हेतु पर्याप्त योग्यता रखता है।"

"तो देर किस बात की आचार्य, कल प्रातः ही उस युवा की परीक्षा हो जाएगी।"

"अवश्य माधव, अब तुम विश्राम करो।"

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उधर पांडुलिपि लेकर वह व्यक्ति बाहर आता है और तेजी से पर्वत से नीचे की ओर बढ़ता है। नीचे आकर मन्दिर के पास बने चबूतरे से कुछ लकड़ियाँ लेकर घाटी की ओर बढ़ चलता है।

वह घाटी थी केदार घाटी, साक्षात महादेव की योगभूमि।
व्यक्ति मंदाकिनी के किनारों के सहारे तेजी से आगे बढ़ रहा था, रात्रि भी घिर आई थी लेकिन आकाश में प्रकाशित चन्द्र से पर्याप्त प्रकाश पृथ्वी पर आ रहा था। इसी प्रकाश के सहारे वह बढ़ता जा रहा था कि अचानक ही एक चट्टान ऊपर से लुढ़कते हुए उसकी तरफ आई और वह किनारे से मंदाकिनी की गोद में जा गिरा

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प्रातःकाल की वेला

माधव अपनी तलवार के साथ युवक की परीक्षा हेतु सज्ज था, और आचार्य विप्लव की प्रतीक्षा कर रहा था।
तभी आचार्य एक युवक के साथ आते हुए दिखाई पड़े, युवक देखने में कहीं से बलिष्ठ नहीं कहा जा सकता था लेकिन हाँ, उसकी चाल की लोच से माधव ने उसके चपल होने का अंदाजा लगा लिया था।

"माधव, यह है अंशुमन, मेरा सबसे प्रिय शिष्य। यह परीक्षा हेतु तुमसे द्वंद करेगा। मेरे विचार से हमें अभ्यास स्थल तक चलना चाहिए।"

"अंशुमन, हम्म...! तो अंशुमन, क्या तुम पूरी तरह तैयार हो?" माधव ने दृढ़ता से पूछा

"जी श्रीमान!" अंशुमन ने उसी दृढ़ता से उत्तर दिया।

कुछ देर पश्चात दोनों अभ्यास स्थल में थे।

"प्रथम प्रहार तुम करो युवक"

और फिर शुरू हुआ वह द्वंद जिसकी कल्पना स्वयं माधव ने कर रखी थी। अंशुमन उसकी सोच से कहीं अधिक फुर्तीला था, यद्यपि उसके वारों में अभी वो शक्ति नहीं थी लेकिन उसका रक्षण लाजवाब था। कुछ देर की परख के बाद जब माधव के वार से अंशुमन की तलवार गिर गई तो फिर माधव ने अभ्यास रोक दिया।

"अंशुमन, निस्संदेह तुम कुशल हो किन्तु तुम्हें मेरे साथ कुछ दिन अभ्यास करना होगा। मैं तुम्हें शक्तिपूर्ण वार करने का प्रशिक्षण दूँगा।"

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दूसरी तरफ दादागुरु उज्जयिनी में महाकाल के मंदिर में पहुँच चुके थे। वहाँ दर्शन करने के उपरांत उनका विचार था कामरूप जाने का....

किन्तु उनदिनों उज्जयिनी नगरी तंत्र-साधना की उच्चस्तरीय केंद्र थी और दादागुरु महान तंत्रसाधक परमानन्द से भेंट करने के इच्छुक थे। इसलिए भगवान महाकालेश्वर के दर्शन करने के बाद वे सीधे माँ गढ़कालिका के मंदिर की ओर बढ़ चले। गढ़कालिका, माँ  महाकाली का जाग्रत स्थान जहाँ श्रीपरमानन्द जी विराजते थे।

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गढ़कालिका माता के मंदिर का परिसर, सुबह की वेला और माँ की आरती की तैयारी हो रही थी। आचार्य परमानंद क्षिप्रा में स्नान कर के आ चुके थे और आरती उन्हीं के हाथों सम्पन्न होनी थी।

दादागुरु आकर चुपचाप एक किनारे खड़े हो गए और आरती की प्रतीक्षा करने लगे। थोड़ी देर में आचार्य परमानंद पधारे और परिसर माँ महाकाली के जयकारों से गुंजायमान हो गया। इसके पश्चात श्यामला-दंडकम् के श्लोक प्रारम्भ हुए और पूरा वातावरण एक अद्भुत गन्ध से सुवासित हो गया।

सर्व तीर्थात्मिके, सर्व मंत्रात्मिके
सर्व यंत्रात्मिके, सर्व तंत्रात्मिके
सर्व चक्रात्मिके, सर्व शक्तयात्मिके
सर्व विद्यात्मिके, सर्व योगात्मिके
सर्व वर्णात्मिके, सर्व गीतात्मिके
सर्व नादात्मिके, सर्व शब्दात्मिके
सर्व विश्वात्मिके, सर्व वर्गात्मिके
सर्व सर्वात्मिके सर्वगे सर्व रूपे
जगन्मातृके पाहि माम् पाहि माम् पाहि माम्
देवि तुभ्यं नमो, देवि तुभ्यं नमो,
देवि तुभ्यं नमो, देवि तुभ्यं नमः

और इसी के साथ आरती सम्पूर्ण हुई, आरती पूर्ण होने के पश्चात जब आचार्य परमानन्द अपने कक्ष की ओर बढ़ने लगे तो दादागुरु भीड़ से निकल कर उनके सम्मुख आ गए।

आचार्य परमानन्द ने एक क्षण को उन्हें देखा और फिर बोले, " अरे गिरधर! तुम यहाँ और इस प्रकार?" और आगे बढ़ कर उन्होंने दादागुरु को हृदय से लगा लिया।

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आचार्य परमानन्द का कक्ष, जिसमें कुशासन पर दादागुरु गिरधर और आचार्य परमानन्द बैठे हैं।

"कहो मित्र! आज इतने वर्षों बाद उज्जयिनी में कैसे आगमन हुआ?"

"परम्! तुम्हें तो ज्ञात है कि इस समय हमारी भारतभूमि म्लेच्छ खिलजियों के अधीन है, दिल्ली पर अलाउद्दीन खिलजी जैसे क्रूर शासक का शासन है। वह सम्पूर्ण भारत को पददलित कर धर्म-परिवर्तन कराने पर आमादा है और उसके मुख्य लक्ष्य हमारे मन्दिर और ब्राह्मण समुदाय हैं।

उसने दक्षिण में आक्रमण राज्य-विस्तार और धार्मिक विद्वेष फैलाने के लिए किया है।

सुदूर दक्षिण में हम अयंगर जो कि वैष्णवों में उच्च और शुद्ध माने जाते हैं, उनके विषय में उसे किसी ने बताया था जिसके चलते उसने हमारे होयसल सम्राज्य पर आक्रमण किया। हमारे महाराज वीर बल्लाल कायर निकले, अपने प्राणों की रक्षा हेतु उन्होंने म्लेच्छ काफूर के आगे घुटने टेक दिए और खिलजियों की अधीनता स्वीकार कर ली। किन्तु महामंत्री विजयेन्द्र को यह स्वीकार नहीं था इसलिए वे सेनापति महिपाल के साथ हमारे पुरोहित अर्थात मेरे पिता के सम्मुख आये।"

"गिरधर, फिर क्या हुआ?"

"फिर पिताजी के नेतृत्व में सभी अयंगरों ने युद्ध का निश्चय किया। चूंकि सेना हमारे साथ थी और यह युद्ध देश और मातृभूमि के लिए था, अतः अन्य कोई विकल्प भी शेष नहीं था। किन्तु हम सभी मिलकर भी खिलजियों की विशाल सेना के समक्ष बहुत कम थे।

हमने मिलकर अपने बलभर युध्द किया और शत्रु सेना को काफी हानि पहुँचाई किन्तु हमारी भी हानि कम न थी।

महामंत्री जी ने फिर सभी अयंगरों को चार अलग समूहों में विभाजित करते हुए एक समूह को साथ रखा और शेष तीन समूह को वेष बदलकर उत्तर दिशा में चले जाने को कहा। उनका कहना था कि जीवित रहेंगे तो युद्ध होता रहेगा। उनको गए आज ५ वर्ष बीत गए, उधर युद्ध में लगभग सभी  मृत्यु को प्राप्त हुए और होयसल में खिलजियों का आधिपत्य हो गया। कई प्राचीन मंदिर तोड़े गए, धर्म परिवर्तन भी हुए।

जो बचे वे धर्म रक्षण हेतु अन्य स्थानों को निकल आये जिनमें से एक मैं भी हूँ, महाराज वीर बल्लाल का सबसे छोटा पुत्र भी जीवित बच गया है जिसे मैं अपने साथ ले आया था।

वो मेरा शिष्य है और सभी शस्त्र-शास्त्र-तर्क-राजनीति-औषधि विज्ञान-संगीत-तंत्रशास्त्र और ज्योतिष में निपुण है।"

"दुःखद! खिलजी की क्रूरता की कहानियाँ मैंने सुन रखी है गिरधर, और उससे पूर्ण परिचित भी हूँ। रणथंभौर में हुए नरसंहार का मैं साक्षी रहा हूँ मित्र किन्तु वह प्रसंग फिर कभी.....अभी बताओ कि मुझसे क्या चाहते हो????"

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मंदाकिनी की लहरों में बहता वह लहरों से संघर्ष कर रहा था लेकिन तीव्र बहाव के आगे उसके प्रयास विफल सिद्ध हो रहे थे, और थोड़ी देर में ही वह थक गया। अचानक उसका सिर किसी शिलाखंड से टकराया और वह बेहोश हो गया।

पांडुलिपि उसके हाथों से निकल कर जल में बह गई थी।

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रात्रि की वेला, आचार्य विप्लव का आश्रम। एक दीपक के प्रकाश में माधव और आचार्य विप्लव बैठे बातें कर रहे थे।

"आचार्य! अंशुमन निस्संदेह एक अद्भुत योद्धा बनेगा। मैं उसे स्वयं प्रशिक्षण दे रहा हूँ किन्तु अब मुझे एक पाक कला विशेषज्ञ की आवश्यकता है। मेरा मार्गदर्शन करें देव"

"माधव! तुम्हारी यही विनम्रता मेरे मन को हर्षित कर देती है पुत्र। यहाँ से लगभग ३० योजन पश्चिम जाने पर तुम्हें एक आश्रम मिलेगा, वहाँ तुम्हारी भेंट देवी श्वेतकीर्ति से होगी। उन्हें मेरा परिचय देना और अपनी समस्या उनको बताना। वे तुम्हारी सहायता अवश्य करेंगी"

"देवी! वे भोजन हेतु??? नहीं आचार्य, मेरे लक्ष्य में स्त्रियों का और......नहीं आचार्य..."

"पूरी बात सुनो माधव! उनका पुत्र शूलकेतु एक अद्भुत रसोइया है जिसकी कीर्ति उस सम्पूर्ण क्षेत्र में व्याप्त है। वह तुम्हारा सहायक बनेगा। दूसरी बात यह कि वह भाला चलाने में निपुण है। तुम चाहना तो परीक्षा ले लेना"

"कोटि कोटि नमन आचार्य! आपने बहुत बड़ी सहायता की है मेरी, किन शब्दों में मैं धन्यवाद ज्ञापित करूँ आपका

मैं कल प्रातः ही देवी श्वेतकीर्ति के आश्रम हेतु प्रस्थान करूँगा।"

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व्यक्ति बहते हुए मंदाकिनी के एक किनारे पर पहुँचता है किंतु अभी भी मूर्छित ही है।

दो साधु मंदाकिनी तट पर जल भरने आये तो उन्होंने उसे तट पर मूर्छित पड़ा देखा।

"कौन है ये युवक??? कहाँ से आया है?? देखो जीवित है क्या"

" महादेव! नाड़ी और श्वांस तो चल रहे हैं, चलो इसे मठ ले चलते हैं।"

कुछ समय पश्चात,

" मैं.....मैं कहाँ हूँ???" अपने चारों ओर देखते हुए, "और आप लोग कौन हैं?"

"वत्स! तुम कालीमठ में माँ महिष-मर्दिनी जगदम्बा की शरण में हो। तुम हमें माँ मंदाकिनी की गोद में मूर्छित अवस्था में मिले। उपचार के उपरांत लगभग २ पहर बाद
 तुम्हारी मूर्छा टूटी है।

मैं एक साधु देवीदास हूँ, और ये मेरे गुरुदेव बाबा विश्वरूपदास हैं"

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कालीमठ मन्दिर के निकट बनी कुटिया में आज उसे 3 दिन हो गए थे, बाबा विश्वरूपदास के औषधिज्ञान और देवीदास के देखभाल के बाद अब वह पर्याप्त स्वस्थ हो चुका था।

बाबा विश्वरूपदास: "पुत्र, तुम कौन हो? कहाँ से आये हो?? सामुद्रिक शास्त्र की मेरी जानकारी के अनुसार तुम या तो किसी राजपरिवार से हो या फिर तुम कोई उच्चकोटि के योद्धा हो।

मूर्छित अवस्था में तुमने अस्फुट स्वर में देवी मंत्र बोले थे, तो ये भी संभव है कि तुम कोई साधक हो।
बताओ, वत्स कौन हो तुम और तुम्हारा केदारघाटी में आने का क्या प्रयोजन है?"

"बाबा, मैं अभी आपके सभी प्रश्नों का उत्तर अवश्य दूँगा लेकिन अभी नहीं। मेरे पास समय बहुत कम है और मुझे हर हाल में भगवान श्रीकेदारनाथ के मंदिर पहुँचना है। मेरी यात्रा का एक पड़ाव है वहाँ, जो मुझे एक नई दिशा देगी"

इतना कह, वह तेजी से निकल गया

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दूसरी ओर आचार्य परमानांद का आश्रम.

"परम्, मुझे अपने सभी विलग हुए बिछड़े साथियों को ढूँढना है, उनकी पहचान कर उन्हें संगठित करना है और साथ ही समाज को जागृत कर म्लेच्छों के विरुद्ध एक नई सेना का भी निर्माण करना है।

तुम्हारे पास तंत्र की शक्ति के साथ ही सम्पूर्ण विंध्यक्षेत्र के बारे में अच्छी जानकारी है। यदि यहाँ यह कार्य सम्पन्न हो सका तो यहाँ का दायित्व तुम्हें सौंप कर मैं पूर्व की ओर कामरूप, सुपर्णदेश और बंगभूमि तक सहायता माँगने अवश्य जाऊँगा।"

"उत्तम गिरधर, किंतु उत्तर की ओर???"

"उत्तर की ओर ही सर्वाधिक आशाएं हैं, इसलिए मैंने अपने शिष्य माधव को उत्तर में भेजा है।"

"माधव! अर्थात महाराज बल्लाल देव का पुत्र??? होयसल का राजकुमार!"

"सही पहचाना आचार्य परमानन्द ने"

इतना कह दादागुरु गिरधर मुस्कुरा दिए।

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"अंशुमन! मुझे कल प्रातः एक अत्यावश्यक कार्य हेतु एक यात्रा पर निकलना होगा। तुम यहाँ आचार्य विप्लव के समीप रहकर अध्ययन करना और अपना अभ्यास भी जारी रखना। मैं शीघ्र ही वापस आऊँगा"

"मुझे भी साथ ले चलिए न देव" अंशुमन ने आग्रह किया

"नहीं मित्र, अभी नहीं। अभी तो हमें बहुत सी चुनौतीपूर्ण यात्राएं साथ-साथ करनी हैं, लेकिन अभी की यह यात्रा मुझे अकेले ही करनी होगी। तुम यहीं मेरी प्रतीक्षा करो"

"जो आज्ञा देव"

"अब तुम शयन करो, मैं तनिक आचार्य विप्लव से मिलकर आता हूँ।"

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आचार्य विप्लव का कक्ष, जिसमें एक दीपक प्रकाशित था और आचार्य भूमि पर बैठे हुए, एक आङ्कीयलेख्य में देखते हुए कुछ विचार कर रहे थे।

"प्रणाम आचार्य"

"कल्याण हो वत्स माधव! आओ, मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था। कल तुम देवी श्वेतकीर्ति के पास जा रहे हो, उनकी सहायता लेने और उनसे उनका पुत्र माँगने, किन्तु वत्स! यह इतना सरल नहीं है।

सबसे दुष्कर तो है वहाँ का मार्ग, जहाँ पग-पग पर तुम्हारी कुशलता, दक्षता और धैर्य की परीक्षा होगी, और उससे भी दुष्कर है देवी श्वेतकीर्ति के सम्मुख तुम्हारे बुद्धिचातुर्य की परीक्षा।

मुझे पूर्ण विश्वास है तुम पर फिर भी मन में एक अंजाना सा भय भी है।"

"भय कैसा आचार्य! मुझे अपनी क्षमताओं पर पूर्ण विश्वास है, और कर्म करना मात्र ही तो हमारे हाथ में है। असफल होने मात्र के भय से मैं प्रयास करना तो नहीं छोड़ सकता न आचार्य, और फिर आप मेरा मार्गदर्शन करने को हैं ही, फिर भय की कोई बात ही नहीं"

"उचित है वत्स, तुम्हारी तर्कशीलता उचित है। अब सुनो, यहाँ से कुछ दूर पश्चिम जाने पर तुम्हें एक विशाल आम्रकुंज मिलेगा जिसके पार एक सरोवर है। सरोवर के मध्य में एक नीला पुष्प है, जो कभी भी नहीं कुम्हलाता। तुम्हें वह पुष्प प्राप्त करना है। पुष्प लेकर तुम जब आगे बढ़ोगे तो आगे एक विशाल वटवृक्ष के नीचे एक शिवमंदिर मिलेगा। उस पुष्प को उस मन्दिर में स्थित नन्दी की प्रतिमा के मस्तक पर रख देना। इससे मन्दिर के पीछे की ओर एक द्वार खुलेगा, जिसका गुप्तमार्ग तुम्हें एक पहाड़ी पर पहुँचायेगा। इस मार्ग से तुम ४ दिनों की यात्रा मात्र १ दिन में पूर्ण कर सकोगे।

मार्ग में तुम्हारी सहायता के लिए मैं तुम्हें यह रज्जु, कटार, कुछ आवश्यक जड़ीबूटियां और यह औषधि दे रहा हूँ। इस औषधि की विशेषता यह है कि इसके प्रयोग से तुम्हें भूख-प्यास का अनुभव नहीं होगा और थकान भी नहीं लगेगी।

अब यह आङ्कीयलेख्य लो, यह मार्ग हेतु तुम्हारी सहायता करेगा, और हाँ, वह नीलपुष्प अत्यंत चमत्कारी है, उसे प्राप्त करने में अतिरिक्त सावधानी रखना।

कल प्रातः शुभ मुहूर्त में यात्रा प्रारंभ करना।"

"जो आज्ञा आचार्य! आपके द्वारा किये गए इस सहयोग हेतु मैं आभारी हूँ किन्तु एक निवेदन है कि मुझे इन वस्तुओं के अतिरिक्त एक तलवार, एक मुद्गर, कुछ समिधा और तन्त्रविधि हेतु आवश्यक वस्तुएं भी दे दें"

"क्या चल रहा तुम्हारे मष्तिष्क में पुत्र?"

"वो सब मुझ पर छोड़ दीजिए आचार्य"

"ठीक है पुत्र, मैं इन सभी वस्तुओं की व्यवस्था करता हूँ। अब तुम विश्राम करो"

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अगली सुबह,

"पुत्र माधव! यह श्यामकर्ण अश्व है जो तुम्हारी यात्रा को सुगम बनाएगा। इसकी पीठ पर मैंने सारी साम्रगी बाँध दी है। इसके अतिरिक्त यह रज्जु है और यह खड्ग

यह मेरा गत २० वर्षों का पूजित खड्ग है जो कि देवी-मंत्रों द्वारा सिद्ध है, जब तक तुम्हारे हाथ में यह खड्ग रहेगा, कोई भी भूत-प्रेत-डाकिनी-शाकिनी-वेताल या माया तुम्हारा कोई अनिष्ट नहीं कर सकेंगी।

अब तुम प्रस्थान करो पुत्र, तुम्हारा कल्याण हो।"

-"आचार्य, आपने मेरी जो सहायता की है वह आप द्वारा मुझपर किया गया वह उपकार है, जिसके लिए मैं जीवन भर आपका ऋणी रहूँगा।
अब मुझे आज्ञा दें। अंशुमन के प्रशिक्षण पर ध्यान दीजिएगा।"

"अवश्य पुत्र! हर हर महादेव"

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श्यामकर्ण अश्व पर सवार हो माधव पश्चिम दिशा की ओर बढ़ चला, वह अश्व अद्भुत था, उसकी गति अत्यंत तीव्र थी इसलिए मात्र दो पहर में माधव आम्रकुंज तक पहुँच गया।

आम्रकुंज तक पहुँचने के बाद माधव ने थोड़ा विश्राम करने के लिए अश्व को एक वृक्ष में बाँध दिया और स्वयं एक बड़े वृक्ष के नीचे बैठ गया।

थोड़ी देर बाद उसे आम्रकुंज में चंदन की सुगंध आने लगी।

"आम्रकुंज में चंदन की सुगंध?? ये कैसी माया है आखिर, क्या मुझे इसका रहस्य ज्ञात करना चाहिए??

नहीं, नहीं...मेरा लक्ष्य कुछ अन्य है..मुझे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए।"

यह सोचकर माधव बैठा रहा लेकिन चंदन की सुगंध अब और तीव्र होती जा रही थी, इसलिए अब माधव उस दिशा में बढ़ चला जिधर से सुगन्ध आ रही थी।

कुछ दूर चलने पर उसने देखा कि एक हवन-कुंड में अग्नि प्रज्वलित है, और उसके समीप एक सुंदर तरुणी स्त्री आँख मूँदे बैठी है।

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दूसरी ओर आचार्य परमानन्द के आश्रम में,

"गिरधर! जहाँ तक मुझे लगता है तो शायद तुम्हारा विचार म्लेच्छों से युद्ध कर के अपना राज्य विजित करने का भी है।"

"हाँ परम्! किन्तु यह इतना सरल नहीं....म्लेच्छ सेना अत्यंत विशाल है, उनसे प्रत्यक्ष युद्ध के लिए हमें भी एक विशाल सेना चाहिए होगी तथा उन्हें पूर्णतः प्रशिक्षित भी करना होगा, विशेषतः म्लेच्छों की धूर्त नीतियों के लिए"

"निःसंदेह मित्र, कदाचित मुझे मार्ग ज्ञात है। विंध्यक्षेत्र में आदिवासियों की जनजातियाँ हैं जो उज्जयिनी से मगध तक विस्तृत हैं, इसके बाद बंग भूमि से और कामरूप से यदि सैन्य-सहायता प्राप्त हो सके तो हम अवश्य युद्ध हेतु सेना का गठन कर सकेंगे।"

"सुपर्ण देश क्या हमारी सहायता नहीं करेगा?"

"उसकी सहायता के लिए कूटनीति का सहारा लेना होगा। इसके अतिरिक्त मालव प्रांत के कुछ वीर और रणथम्भौर के राजपुत्र भी मेरे सम्पर्क में हैं।"

"साधु! साधु! परम्..
यदि हमारी योजना सफल हो सके तो एक कार्य तो आंशिक पूर्ण ही हो जाएगा। शेष बचेगा अपने साथियों की खोज करना तो उसके लिए हमें सतत प्रयासरत रहना होगा।"

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दूसरी ओर वह आश्रम से निकल कर पुनः केदारेश्वर की तरफ बने रास्ते पर बढ़ चला था, यह सुबह के बाद की वेला थी, आकाश में सूर्य पूर्ण प्रखरता से प्रकाशित था लेकिन शीतल हिमशिखरों को
छूकर आने वाली हवाएं शीतलता का अहसास करा रही थीं, नीचे मंदाकिनी के तीव्र वेग से उठने वाला स्वर वातावरण की नीरवता को भंग कर दे रहा था।

"मुझे अतिशीघ्र गौरीकुंड पहुँचना होगा, वहीं मुझे आगे का मार्ग मिलेगा। यद्यपि पांडुलिपि माँ मंदाकिनी में प्रवाहित हो गई है किंतु मुझे वह पूर्णतः कंठस्थ है।

यही वह मार्ग था जिसपर चलकर मैं केदारेश्वर आया था और मुझे गौरीकुंड पहुँचकर वह श्वेत-प्रस्तर और पीताम्बर में लिपटा सन्देश प्राप्त करना ही होगा।"

यह सोचते-सोचते वह आगे बढ़ रहा था और अब ब्रह्मशिला तक पहुँच गया था, उसने देखा कि शिला पर स्थापित चक्र पर किसी ने कुमकुम चढ़ाया है और उसपर ताजे फूल चढ़े हैं।

"अवश्य ही यहाँ कोई आया है या रहता है, मुझे यह ज्ञात करना होगा।"

इतना कह कर वह शिला से आगे की ओर बनी एक दीवार की ओट में छिप गया।

दीवार के पीछे एक मन्दिर था, जहाँ पहुँचने के लिए नीचे की ओर सीढ़ियाँ उतरती थीं।

थोड़ी देर में एक अत्यंत वृद्ध साधु अंदर से बाहर की तरफ आया, उस साधु को पहचान कर वह हर्षमिश्रित आश्चर्य में डूब गया और सहसा ही बोल उठा, "हे महादेव! आपकी लीला अद्भुत है, अद्भुत है प्रभो"

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माधव चकित सा उस स्त्री की तरफ बढ़ा, और उस स्त्री के सम्मुख जाकर खड़ा हो गया, उसने देखा कि हवन-कुंड के समीप रक्त था और कदाचित एक पशु की बलि दी गई थी।

माधव चूंकि तंत्र और ज्योतिष का प्रकांड विद्वान था, इसलिए वह तुरन्त समझ गया कि वह कोई साधारण स्त्री न होकर एक योगिनी है जो तंत्र-साधना कर रही है। उसने योगिनी की साधना में विघ्न न डालने का निश्चय किया और पुनः जब वह अश्व पर सवार होने ही जा रहा था  कि उसके पीछे से आवाज आई।

"रुको युवक!"

माधव के कदम वहीं रुक गए, वह पलटा और उसने देखा कि योगिनी तरुणी की आँखें रक्तवर्णी थीं और कदाचित मदिरापान की वजह से वह उन्मत्त भी लग रही थी। माधव के हाथ उसके कमर में खोंसे खड्ग की मूंठ पर कस गई।

"देवि! मैं पथिक हूँ, तनिक शीघ्रता में हूँ, मार्ग भूलकर इधर आ गया था इस हेतु क्षमा चाहता हूँ, आज्ञा दें"

"युवक! असत्य संभाषण का कारण कदाचित तुम्हारा भय है या नीति, लेकिन मुझे तुम्हारे विषय में सब ज्ञात है। तुम्हारी यात्रा का प्रयोजन भी मुझे ज्ञात है।

मैं योगिनी नहीं वरन रणथम्भौर की राजकुमारी सुवर्णा हूँ, मैंने कुछ तंत्र-क्रियाएं सिद्ध की हैं और मैं इस वन के मार्गों से भलीभाँति परिचित भी हूँ।"

"देवि! निश्चित ही आप तन्त्रविधि द्वारा मेरे हृदय की बातें और मेरा उद्देश्य जानती हैं किन्तु जो आप कह रही हैं उसका प्रमाण???"

"उसके दो प्रमाण हैं, पहला ये राजचिन्ह जो मेरे दाहिने हाथ पर अंकित है, और दूसरी यह राजमुद्रा।
आशा है अब तुम्हें विश्वास होगा"

"पूर्ण विश्वास तो मैं कभी किसी पर नहीं करता, फिर भी तुम पर विश्वास कर लेता हूँ, लेकिन तुम्हें एक परीक्षा देनी होगी।"

"कैसी परीक्षा?"

"मैं मृत्तिका और मेरे पास उपस्थित काले तिल से एक अंक-वेदिका बनाऊंगा, तुम्हें उस वेदिका के ऊपर चलकर उसे पार करना होगा।"

"ठीक है यदि तुम्हें इसी में संतुष्टि मिलती है तो मैं सज्ज हूँ।"

माधव ने अपने खड्ग द्वारा भूमि पर मिट्टी की सहायता से एक वेदिका बनाई और उसे आठ भागों में बाँटकर, अभिमंत्रित काले तिल अलग-अलग मात्रा में उन भागों में रखे, साथ ही साथ वह कोई मंत्र भी बुदबुदाता जा रहा था। थोड़ी ही देर में अंकवेदिका तैयार थी।

"अब आप इस वेदिका को चलकर पार कीजिये"

तरुणी स्त्री आगे बढ़कर उस वेदिका के मध्य भाग में खड़ी हो जाती है और हाथ जोड़कर प्रार्थना करती है।

"हे एकलिंग! यदि मैं सत्यनिष्ठ हूँ तो इस परीक्षा को पूर्ण करें"

और इतना कहकर वह वेदिका को चलते हुए पार कर जाती है।

"राजकुमारी सुवर्णा, आप की परीक्षा सफलतापूर्वक पूर्ण हुई, साथ ही मेरा सन्देह भी दूर हुआ।"

"क्या सन्देह था तुम्हें?"

"यही कि तुम कोई मायावी योगिनी तो नहीं, चाहता तो तन्त्र द्वारा यह जान सकता था लेकिन तंत्र का विधान यह है कि बिना किसी खास उद्देश्य के उसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। उद्देश्य सत्कार्य में हों तो उत्तम"

"जानकर प्रसन्नता हुई कि आपका सन्देह दूर हुआ। अब मैं आपको नीलपुष्प तक ले चलूँगी, वहाँ से आगे का मार्ग आपको स्वयं तय करना होगा। नीलपुष्प के विषय में बता दूँ कि वह अत्यंत चमत्कारी है और बिना उसके आप देवी श्वेतकीर्ति तक नहीं पहुँच सकेंगे, उस पुष्प के चारों ओर तीन रक्षा-चक्र हैं और उसमें तुम्हारे धैर्य, साहस और विद्वता तीनों की परीक्षा हो जाएगी।"

"देवि, मुझे आप माधव कह कर पुकार सकती हैं, और मैं प्रत्येक परिस्थिति हेतु सज्ज हूँ।"

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दूसरी ओर,

दादागुरु गिरधर और आचार्य परमानन्द विन्ध्य के गह्वरों में बढ़ते हुए पूर्व की ओर बढ़ते जा रहे थे, एक सघन वन्य-प्रदेश में पहुँचते ही आचार्य परम् ने कुछ हलचल महसूस की, और दादागुरु गिरधर को सावधान रहने का संकेत किया।

"श्शशश.... सावधान गिरधर, यहाँ   कोई है...शायद आदिवासियों की टोली"

"तो हम क्या करेंगे अब?"

"कुछ भी नहीं, वे खुद हमें घेरेंगे और अपने मुखिया के पास ले जाएंगे, और यदि उन्होंने प्रहार किए तो हम उचित जवाब देंगे।"

"उचित है"

तभी अचानक से वृक्ष की जड़ों से बनी एक रज्जु दादागुरु गिरधर के पैरों से टकराई और जब तक वे कुछ समझ सकते वो रज्जु उन्हें ऊपर खींच ले गई, और बिल्कुल यही आचार्य परमानन्द के साथ भी हुआ।

"किसने लटकाया है हमें, नीचे उतारो....कौन है यहाँ... सामर्थ्य है तो सामने आओ"

अचानक आदिवासियों का एक दल उस वृक्ष के नीचे आकर एकत्र हो गया जिसमें १० के करीब आदिवासी सैनिक थे, उनमें से प्रत्येक के हाथों में पत्थरों के बने नुकीले भाले थे।

"वस्त्रों से तो ये आलिम लग रहे हैं, इन्हें सरदार के सामने ले चलते हैं, वही तय करेंगे कि इन आलिमों का क्या करना है"

दादागुरु और आचार्य परम् ने आँखों ही आँखों में संकेत किया, और मौन हो गए।

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उधर,

दूसरी तरफ ब्रह्मशिला के समीप उस वृद्ध साधु को देखकर वह हर्षित होकर उनके पैरों में गिर पड़ा...हर्षातिरेक से उसके नेत्रों से अश्रु बह चले।

वह साधु घबराकर पीछे हट गया,
"कौन हो तुम वत्स?"

"दादागुरु! आपने मुझे नहीं पहचाना, मैं...मैं आपका माधव"

"माधव! तुम जीवित हो....पुत्र म्लेच्छों से युद्ध के बाद हम बिछड़ गए थे, हमें तुम्हारी कोई खबर नहीं थी, आचार्य परमानंद और सुपर्णदेश के महाराज वृषकेतु युद्धबन्दी बनाये गए थे और कदाचित खिलजियों ने उनका वध कर दिया हो।"

"दादागुरु, महाराज वृषकेतु को हमारे लोगों ने मुक्त करा लिया था और आचार्य परमानन्द ने अपनी तन्त्रसाधना का प्रयोग करते हुए खिलजियों की सेना में भ्रम उत्पन्न  कर दिया था, तब तक मैं, अंशुमन, वृषाल और शूलकेतु उनके साथ ही थे। फिर मैं और अंशुमन पीछे से आ रहे सैन्यदल से युद्ध कर रहे थे और आचार्य वृषाल और शूलकेतु के साथ वन्यक्षेत्र में किसी गुप्त स्थान पर चले गए।"

"पुत्र, आओ पहले विश्राम करो, फिर इस गाथा को सुनेंगे, बहुत कुछ है तुमसे सुनने को और तुम्हें बताने को"

"जी दादागुरु! किंतु यह स्थान और आप यहाँ कैसे?"

"यह त्रियुगीनारायण मन्दिर है, यहाँ शिव-पार्वती का विवाह हुआ था, जो ब्रह्मशिला तुम देख रहे हो वह वही पीठ है। मैं यहाँ कैसे आया, यह लम्बी कथा है, आओ बताता हूँ।
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राजकुमारी सुवर्णा के साथ माधव  अपने अश्व पर सवार हुए और दोनों वहाँ से पश्चिम की ओर बढ़ गए, आङ्कीयलेख्य की सहायता से वे कुछ देर में एक ऐसी जगह पहुँचे जहाँ आगे वह पर्वत श्रेणी समाप्त होती थी और आगे गहरी खाई थी, उस खाई को पार किये बिना दूसरी पर्वत-श्रेणी तक पहुँचना कठिन था।

"राजकुमारी, यह मार्ग तो यहाँ अवरुद्ध है, यद्यपि मेरे पास पर्याप्त लम्बाई की रज्जु है किंतु क्या कोई अन्य वैकल्पिक मार्ग भी है?"

"माधव जी, मार्ग है तो लेकिन वह और मुश्किल है, आपको उसके लिए नीचे उतरना होगा और इस तीव्र बहाव वाली नदी को पार करने के उपरांत ऊपर चढ़ाई करनी होगी।"

"उससे उचित तो रज्जु द्वारा ही पार करना है, क्योंकि मेरे पास अधिक समय भी नहीं है किंतु इस रज्जु से एक बार में एक ही व्यक्ति पार हो सकेंगे। सामने के पर्वत टीले पर वो वृक्ष दिख रहा है, मैं उसकी शाखा में इस रज्जु को फँसाने का प्रयास करता हूँ।"

माधव ने रज्जु को वृक्ष तक फेंकने का प्रयास किया किन्तु दूरी कुछ अधिक होने के कारण वह असफल रहा।
अंत में ८-१० प्रयासों के उपरांत आख़िरकार उसने रज्जु को वृक्ष की शाखा में फंसाने में सफलता प्राप्त कर ही ली।

"राजकुमारी, यह अश्व तो अब यहाँ से पार नहीं जा सकेगा, इसलिए इसपर रखी सभी सामग्रियों को मैं अपने कंधे पर लटका लेता हूँ, और इसके साथ मैं पार होऊँगा, इसलिए पहले मैं पार जाऊँगा। इसी के साथ रज्जु की दृढ़ता का भी ज्ञान हो जाएगा।"

"रज्जु की दृढ़ता ही ज्ञात करनी है तो पहले मैं जाना चाहूँगी, क्योंकि आपका जीवन मुझसे अधिक मूल्यवान है। इसलिए पहले मुझे जाने की आज्ञा दें"

"किन्तु देवि...."

जब तक माधव कुछ कह पाता राजकुमारी सुवर्णा रज्जु पर तंतु की बनी चकरी की सहायता से लटक चुकी थीं, और चकरी फिसलती हुई तेजी से उन्हें पार लेती गई।

अब बारी थी माधव की, माधव ने सभी साम्रगी अपने कंधे पर लटकाया और दूसरी चकरी को रज्जु पर डाल आगे बढ़ चला।

 साम्रगी में सहदेवी का पौधा, गोरोचन, केसर, सिंदूर, अपामार्ग, लटजीरा, भृंगराज, तुलसी, काली हरिद्रा, गोमती चक्र, एकाक्षी नारियल, तिल, कमलगट्टे और स्फटिक की माला, नींबू, मोगरे के फूल, और दक्षिणावर्ती शंख आदि थे।

बीच मार्ग में पहुँचने पर साम्रगियों की अधिकता से एकाक्षी नारियल उसके झोले से सरककर नीचे गिर पड़ा, इधर नारियल सरका और उधर माधव उस पार पहुँच गया लेकिन नारियल सरक कर नदी में एक प्रस्तर खण्ड पर गिरा और दो भागों में टूट गया। नारियल कीलित था अतः उसके मंत्र शक्ति के प्रभाव से वह शिलाखंड तीव्र विस्फोट के साथ चूर-चूर हो गया।

"यह क्या था माधव जी? भला एक नारियल से शिला कैसे टूट गई....मैं अभी तक स्तब्ध हूँ।"

"राजकुमारी जी, आपने तंत्र साधना की है न कुछ"

"हाँ, लेकिन आरम्भिक ही"

"तो यह समझिए कि यह तंत्र की शक्ति की झलकी मात्र है। चलिए अधिक न सोचिए, आगे बढ़ते हैं। बताइये सरोवर किधर मिलेगा?"

"आइये इधर मेरे पीछे, यहाँ से बस आधे योजन दूर वह सरोवर है।"

थोड़ी दूर चलने के बाद अब वो सरोवर सामने था जिसमें माधव को नीलपुष्प मिलना था।

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जमीन पर उतरते ही दादागुरु गिरधर का संकेत समझ आचार्य परमानन्द ने अपनी कलाई में बंधे रुद्राक्ष से एक रुद्राक्ष तोड़ कर अपने और दादागुरु के चारों ओर एक रेखा खींच दी, आदिवासियों ने बहुत कोशिश की लेकिन उस रेखा को पार नहीं कर सके।

"आप सभी सुनिये, हम साधु लोग हैं, आपके शत्रु नहीं हैं। हम आपका कोई अहित नहीं करेंगे, हम तो स्वयं ही आपके शासक से मिलना चाहते हैं, कदाचित उनसे भेंट करके हम अपने विचारों से उन्हें अवगत करा सकें।" दादागुरु गिरधर ने कहा

"झूठ बोलते हो तुम, तुम जादूगर हो जो हमें और हमारे साथियों को  नष्ट करने आये हो।" एक आदिवासी युवक जो उस दल का प्रमुख प्रतीत होता था, उसने कहा

"विवेक से कार्य लो युवक, हम जो कह रहे वह सर्वथा सत्य है। तुम चाहो तो अपने प्रमुख से हमारी भेंट करवा सकते हो।" इस बार आचार्य परमानन्द ने कहा

"ठीक है, तुम लोग यहीं रहो, मेरे साथी तुम लोगों पर दृष्टि रखेंगे, मैं
 सरदार को लेकर यहीं आता हूँ।"

"उचित है"

थोड़ी देर बाद एक विशालकाय मनुष्य जो कि चारों ओर से आदिवासियों से घिरा हुआ था, आता दिखाई दिया। उसने मृग की छाल से बने वस्त्र पहने थे और सिर पर वृषभ का श्रृंग मुकुट की भाँति धारण किया था। उसके एक हाथ में तलवार और दूसरी हाथ में एक दंड था जिसके ऊपरी हिस्से पर सिंह का मुख बंधा था।
वेशभूषा से वही उन आदिवासियों का सरदार प्रतीत हो रहा था।

"आचार्य, ये पर्वताकार शरीर वाला व्यक्ति कौन है? इसे देखकर आश्चर्य हो रहा कि आज के युग में भी ऐसी काया के मनुष्य हैं"

"मित्र गिरधर, ये जो विशालकाय पर्वत के समान व्यक्ति आता दिख रहा है, यही इन आदिवासियों का सरदार अरिमुख है, और मेरे शिष्य वज्रबाहु का परम मित्र है"

"आपके शिष्य का मित्र?? यह तो नवीन जानकारी दी आपने... फिर तो वो आपको पहचान जाएगा।"

"नहीं...वह मुझसे परिचित नहीं, किन्तु मेरे आश्रम के इस मृगचिन्ह से अवश्य परिचित है वह। इसे देखकर वह इतना जरूर समझ जाएगा कि मैं वज्रबाहु के साथ का अथवा उसी आश्रम का हूँ। उसके पश्चात मैं उसे अपना परिचय दूँगा।"

यह कहकर आचार्य परमानन्द ने उस चिन्ह को अपने माथे पर धारण कर लिया।

आदिवासियों के सरदार के निकट आने पर आदिवासियों ने हर्षनाद किया और सरदार का जयघोष किया।

"सरदार अरिमुख की जय!"

अरिमुख दोनों आचार्यों के निकट आया और जब उसकी दृष्टि आचार्य परमानंद के मृगचिन्ह पर पड़ी तो वह एक कदम पीछे हट गया।

"आलिम! आपके पास यह चिन्ह कैसे आया??? सत्य कहिए, कौन हैं आप??"

"वत्स अरिमुख, मैं तुम्हारे मित्र वज्रबाहु का गुरु हूँ, आचार्य परमानन्द! कदाचित वज्रबाहु ने तुम्हें मेरे विषय में बताया हो"

आचार्य ने और सभी अन्य ने देखा कि वह विशाल गिरिवदन अरिमुख आचार्य के चरणों में लेटा हुआ था।

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'क्रमशः'

NeeRaj K. Gupta

Comments

  1. क्या ये किसी पुराने ऐतिहासिक उपन्यास का अँश है?

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