पूरे इश्क़ की अधूरी कहानी



"जयपुर की हवाओं में इश्क़ घुला है, सबकुछ तो जाना पहचाना सा ही है।"
बड़े चौपड़ चौराहे से गुजरते रोहन ने सोचा। आज 8 साल बाद जयपुर आया था। रोहन, एक मल्टीनेशनल कम्पनी का सीनियर मैनेजर था और कम्पनी के ब्रांड प्रमोशन के सिलसिले में जयपुर एक सेमिनार अटेंड करने आया था।
वो खो गया आठ साल पहले की यादों में जब वो अपनी पहली नौकरी के चलते जयपुर आया था और बारिश की पहली फुहार ने उसका स्वागत किया था।

इंटरव्यू 10 बजे से था और वहीं तो पहली बार मिली थी 'वो'। सुर्ख होंठ, बड़ी-बड़ी आँखें, झक दूधिया गोरा रंग और कोयल सी पतली आवाज, कुल मिला कर एक आकर्षक व्यक्तित्व जिसमें रोहन खो गया था। उसी ने तो उसका ध्यान तोड़ा था, "हेलो! आपका नाम पुकारा जा रहा है, जाइये।"

"आपको कैसे पता मेरा नाम?" हकलाते हुए रोहन बोला
"वो आपकी फाइल पर लिखा है न, वहीं से देखा"
"ओह! यू आर टू स्मार्ट"
"नहीं, नहीं...बस यूं ही" उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया

दिल तो किया कि वो भी 'उसका' नाम पूछे पर हिम्मत नहीं हुई।

फ़िलहाल इंटरव्यू में रोहन सफल हुआ और उसको दो दिन बाद ज्वाइन करना था औऱ वो यह खबर अपने मम्मी-पापा को दे रहा था कि अचानक पीछे से फ़िर वही आवाज़
"बधाई आपको।"
"अरे आप, शुक्रिया। आपने भी तो इंटरव्यू दिया था न, क्या हुआ?"
"जी, मैं भी सेलेक्ट हो गयी।"
"अरे वाह, आपको भी बधाई, किस डिपार्टमेंट में?"
"ऑपरेशन्स में बैक ऑफिस, ऑपरेशन हेड के अंडर काम करना है, मैं उनकी पर्सनल सेक्रेटरी रहूँगी।"

रोहन चौंक पड़ा, क्या इत्तेफ़ाक है, ये उसी की सेक्रेटरी होगी....बेचैन सा हो गया वो

"क्या आपको पता है कि ऑपरेशन्स हेड कौन है?"

"नहीं, अभी तो नहीं पता। कोई भी हो, मुझे तो अपने काम से मतलब"

"हाँ वो तो है। अगर आप बुरा न मानें तो क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ?"

"इसमें बुरा क्या मानना, अर्चिता नाम है मेरा, अर्चिता शुक्ला"

रोहन गुप्ता- अर्चिता शुक्ला वो सोचने लगा।

"आपका कौन सा डिपार्टमेंट है रोहन जी?"
"मैं भी ऑपरेशन्स में ही हूँ, अर्चिता जी!"

"अरे वाह! आप तो हमारे ही साथ होंगे फिर तो"

हाँ! हमेशा साथ रहना चाहता हूँ, चाहा तो लेकिन कह नहीं पाया वो।

"क्या हम साथ कॉफ़ी पी सकते हैं?"

"हाँ बिल्कुल! लेकिन बिल पे मैं करूँगी, मंजूर हो तो चलिए।"
"आप क्यों करेंगी? फिर भी आप कहती हैं तो जरूर कुछ reason होगा। फ़िलहाल आइये"

कॉफ़ी पीते-पीते रोहन ने पूछा, "अर्चिता जी, आप यहीं जयपुर से हैं क्या?"

"नहीं, गोरखपुर से हूँ। और आप?"

"मैं लखनऊ से हूँ।" "तो क्या आप कंपनी के दिए क्वार्टर में रहेंगी"

"हाँ, सोच तो रही हूँ पर एक बार देख लूँ फ़िर फाइनल करूँगी। वैसे आप कहाँ रहियेगा?"

"मैं भी कंपनी के दिए फ्लैट्स में ही"

"जल्दी एलॉट करवाना होगा, पता नहीं बाद में खाली न बचे तो बहुत दिक्कत होगी" अर्चिता बोली

"हाँ, चलिये अप्लाई करते हैं।"
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अगले दिन,
रोहन को दो कमरों का सभी सुविधाओं युक्त बड़ा फ्लैट मिल गया A ब्लॉक में, आखिर कंपनी का ऑपरेशन्स हेड था वो।

वहीँ अर्चिता को एक 5 लोगों के साथ शेयरिंग क्वार्टर मिला, C ब्लॉक में, इस वजह से वो काफी परेशान थी।

कैंटीन के बाहर मख़मली घास वाली लॉन पर बैठा अपने डॉक्युमेंट्स रेडी कर रहा था, आज जॉइनिंग लेटर लेना था। अर्चिता उसे ढूँढते हुये उसके पास पहुँची।

"हेलो रोहन जी। मुझे HR डिपार्टमेंट से जॉइनिंग लेटर लेना है, क्या साथ चल सकेंगे?"

"हाँ, हाँ, क्यों नहीं।" अपने पेपर्स सम्हालता बोला रोहन

HR ऑफिस में आज काफी गहमा-गहमी थी, आखिर हो भी क्यों न! सभी को अपने पेपर्स जमा करके जॉइनिंग लेटर्स लेने और रूम या फ्लैट एलॉट कराने की जल्दी थी।

"सर। मैं अर्चिता शुक्ला, जॉइनिंग लेटर लेना था सर, सारी फॉर्मेलिटी चेक कर लीजिए प्लीज"

"मैम, सारे डॉक्युमेंट्स की 2 कॉपी और 4 फोटो इस फोल्डर में रख के 3 नंबर केबिन पर दे दीजिए, वहाँ श्रुति मैम होंगी जो आपकी जॉइनिंग फॉर्मेलिटी कम्पलीट करवा देंगी।"

"ओके सर, थैंक्स"

"सर। मैं रोहन गुप्ता"

"अरे सर आप। गुड मॉर्निंग सर, सर आपका जॉइनिंग लेटर डायरेक्टर सर के पास है, आप उनसे मिल कर ले लीजियेगा।"

"ओके, मैं देखता हूँ।"

अर्चिता हैरानी से, "ये इन्होंने आपको विश क्यों किया और ये डायरेक्टर सर का क्या चक्कर है! आखिर बात क्या है?"

"बात क्या, कोई बात नहीं है"

"आप छुपा रहे हो, दोस्त मानते होंगे तो बता देंगे"

दोस्त! अब तक तो रोहन उसे सबकुछ मान चुका था।

"अच्छा सुनिये। मैं यहाँ ऑपरेशन्स हेड हूँ, इसलिए"

"क्या?.......आ..आ..आप...सॉरी सर...वो...मैं"

"देखा, इसीलिए मैं छुपा रहा था"

"सॉरी सर, मुझे पता नहीं था"

"अर्चिता जी, अभी आपने दोस्त बोला था तो सर नहीं सिर्फ रोहन"

"यस सर"

"फिर से वही सर! देखिये आप यहाँ वो पहली शख्स हैं जिससे मेरा परिचय हुआ है, और अभी-अभी दोस्ती हुई है, तो अब दोस्ती में ये सब फॉर्मेलिटी क्यों"

"जी, वो सब ठीक है लेकिन मैं आपकी सेक्रेटरी हूँ।"

"ओके, तो सेक्रेटरी का मुख्य कार्य क्या होता है"

"जी, बॉस का ऑफिस सम्हालना"

"हम्म...करेक्ट...मतलब आप मेरा ऑफिस सम्हालोगी, पर अगर आप इज़ाज़त दो तो एक दरख्वास्त मेरी और है"

"जी, कहिये" उसने झुकती हुयी पलकों से कहा

"ऑफिस के साथ-साथ क्या आप मेरी जिंदगी को भी सम्हालेंगी?, देखिये आराम से सोचकर जवाब दीजियेगा और ख्याल में सिर्फ मुझे यानी रोहन को लाइयेगा, बॉस को नहीं"

"जी....ये....आप....ये, मैं क्या कहूँ?" अर्चिता शरमाते हुए बोली। हया की लाली उसके गालों पर बिखर गयी थी।

"वही जो आपका दिल कह रहा है।"

"मैं सोचकर जवाब दूँगी।" अर्चिता ने पलकें झुकाये हुए ही कहा।

"मैं इंतज़ार करूँगा। आपको रूम मिला क्या?"

"मिला तो है लेकिन 5 लोगों के साथ शेयरिंग में, मैं नहीं रह पाऊँगी, इसीलिए थोड़ा परेशान हूँ।"

"मेरे पास एक हल है इस परेशानी का"

"क्या?" अर्चिता उत्सुकता से बोली

"आप अभी कंपनी के गेस्ट हाउस में ही हो न, मैं भी वहीं हूँ, डिनर के बाद मुझे बाहर लॉन में मिलिएगा"

"जी, कोशिश करूँगी।"

****************

रोहन अपने कमरे में लेटा सोच रहा था, "जितनी जरूरी ये नौकरी है उतना ही ज़रूरी उसका इकरार भी तो है, जाने क्यों वो अपनी सी ही लगने लगी है मुझे, बस दो मुलाकातों में ही, पता नहीं वो हाँ कहेगी या नहीं"

उधर अर्चिता के मन में भी उथल-पुथल मची थी, "कितनी आसानी से बोल गया वो, आखिर क्या बोलूँगी उसे, कुछ भी तो नहीं जानती मैं उसके बारे में। और मम्मी-पापा को क्या बोलूँगी, चलो मम्मी को मना भी लूँ तो पापा ! और भैया तो जान ले लेंगे मेरी,
ओ हेलो! क्या सोच रही मैं और क्यों सोच रही, जब मुझे पता है सब कुछ लेकिन अच्छा तो वो भी लगता है मुझे, सर है तो क्या हुआ देखती हूँ थोड़ा तड़पाउंगी बच्चू को फिर हाँ बोल दूँगी। और उसने तो मिलकर हेल्प करने को बोला है।"

डिनर के टाइम भी दोनों के दिमाग में यही चल रहा था।

खैर, डिनर के बाद मिलने का वादा था तो अर्पिता बाहर लॉन में पहुँच गयी लेकिन रोहन वहाँ नहीं था, वो इधर-उधर ढूँढने लगी लेकिन रोहन उसे नहीं मिला।
परेशान होकर उसने रोहन को पुकारना शुरू कर दिया लेकिन कोई जवाब नहीं। अब उसे घबराहट होने लगी थी और मारे घबराहट के वो रोने लगी।

उसे रोते देख रोहन जो कि डाइनिंग के ऊपरी मंजिल पर था और उसे सिर्फ देख रहा था, भागते हुए आया और अंजान बनते हुए पूछा

"सॉरी अर्चिता जी, वो मैं कुछ काम था, इसलिए लेट हो गया था, लेकिन आप रो क्यों रहीं हैं?
घबराइये मत मैं आपकी परेशानी का हल ले आया हूँ।"

"यू डफर! मुझे बुला के कहाँ खो गए थे तुम, मैं तुमको पागलों की तरह ढूँढ रही थी, और तुम ठीक हो न
तुम टाइम से क्यों नहीं आये" अर्चिता रोते रोते ही बोली और रोहन के कंधे पर सर रख कर और तेजी से रोने लगी।

"अर्चिता....अर्चिता...प्लीज चुप हो जाओ! अब तो मैं यहीं हूँ न, तुम्हारे पास, तुम्हारे करीब, प्लीज चुप हो जाओ"

"आं...हाँ!"खुद को रोहन से अलग करते और सम्हालते हुए अर्चिता बोली "सॉरी, वो आप नहीं आये थे तो मैं....और ये सब.....सॉरी सर"

"अर्चिता मुझे मेरा जवाब मिल चुका है और तुम्हारी मेरे लिए जो तड़प है वो देख ली है मैंने"

"लेकिन..."

"मैं आज इस आसमां के नीचे तारों और चाँद को गवाह मानकर तुमसे तुम्हारा हाथ माँगता हूँ, अर्चिता क्या तुम मेरी बनोगी?" घुटनों पर बैठते हुए रोहन ने अर्चिता के सामने प्रस्ताव रखा

"रोहन जी, खुशनसीब होगी वो लड़की जिसे आप जैसा हमसफ़र मिलेगा, मैंने बहुत सोचा, आपको लेकर। दिल कुछ कहता है और दिमाग कुछ, समझ नहीं पा रही किसकी सुनूँ"

"प्यार के राही हमेशा दिल की सुनते हैं अर्चिता"

"पर हम अलग कास्ट के हैं, हमारे घर वाले न माने तो"

"वो तुम मुझ पर छोड़ दो, मैं पूरी कोशिश करूँगा उनको मनाने की"

"ठीक है"

"तो क्या तुम मुझसे प्यार करती हो?"

"हाँ! मैं भी आपसे प्यार करती हूँ" पूरे आत्मविश्वास के साथ लेकिन हौले से बोली अर्चिता

रोहन को तो जैसे सारे जहाँ की खुशियाँ मिल गयी हों, अब रोने की बारी उसकी थी, उसने अर्चिता को गले लगाया और दोनों के अश्क बह निकले, ख़ुशी वाले, भरोसे वाले

"तुम मेरे साथ रहोगी अब से, मेरे फ्लैट में, प्लीज़ न मत करना"

"क्या, तुम्हारे साथ? लेकिन दुनिया और समाज, ऑफिस का स्टॉफ सब तरह तरह के सवाल करेंगे, मैं एक लड़की हूँ, क्या जवाब दूँगी मैं?"

"तुम अपने मम्मी-पापा को यहाँ बुला सकती हो?"

"हाँ, लेकिन काम क्या होगा"

"तुम बुलाओ तो, मैं उनसे तुम्हें माँग लूँगा"

"मरोगे तुम, मेरे पापा प्रोफेसर हैं इतिहास के गोरखपुर यूनिवर्सिटी में और वो बहुत सख्त हैं"

"हो सकता है लेकिन क्या तुम इस बात से इंकार करोगी कि वो तुम्हें बहुत प्यार करते हैं।"

"हाँ वो मुझे बहुत प्यार करते हैं, "

"तो उन्हें बुलाओ न, मैं उनसे बात करूँगा"

"ठीक है"

***

"नमस्ते अंकल, नमस्ते आँटी। मैं रोहन, अर्चिता का बॉस, अर्चिता मेरे साथ ही काम करती है।"

"नमस्ते बेटा" अर्चिता की मम्मी बोलीं

"आपलोग जयपुर घूमे क्या?"

"नहीं बेटा, घूम लेंगे। अभी तो आये हैं"

"आँटी जी, अंकल जी। दरअसल मुझे आप लोगों से कुछ जरूरी बात करनी है, जिसके लिए मेरे कहने पर अर्चिता ने आप लोगों को यहाँ बुलाया है।"

"मुझे पता है, जरूर इसने कुछ गलती की होगी" इस बार पहली बार बोले अर्चिता के पापा

"जी नहीं अंकल, अर्चिता ने कोई गलती नहीं की है, गलती मुझसे हुयी है, असल में मैं आपकी बेटी को पसंद करने लगा हूँ और उससे शादी करना चाहता हूँ, वैसे ये बात मेरे मम्मी-डैडी को करनी थी लेकिन मैं ही कर रहा हूँ तो मुझे आप लोगों की अनुमति चाहिए"

"क्या बोले तुम? हमारी बेटी से शादी, दिमाग सही तो है आपका, हम ब्राह्मण हैं और तुम गुप्ता। हमारी जातियाँ नहीं मिलतीं, गोत्र अलग हैं, रिवाज और मान्यताएं अलग हैं तो ये संभव नहीं"

"अंकल! आप तो हिस्ट्री के प्रोफेसर हैं फिर भी इन सब बातों को मानते हैं, जातियाँ तो खुद इंसान ने बनाई हैं न कि ईश्वर ने। फिर इन जातियों के बंधन में बाँध कर आप क्यों मेरे प्यार का गला घोंट रहे हैं?"

"तुम लोग आधुनिकता के नाम पर कुछ भी करोगे और हम मान जाएंगे" "नहीं हो सकती ये शादी"

"पापा! क्या मेरी भी ख़ुशी के लिए नहीं, आखिर कमी क्या है रोहन में, अच्छे विचार हैं, पढ़े-लिखे हैं और मुझसे ऊंची पोस्ट पर अच्छी सैलरी के साथ हैं, फिर भी क्या"

"मैंने कहा दिया एक बार, नहीं मतलब नहीं, तुम कल हमारे साथ चल रही हो अपनी मौसी के यहाँ, गुड़गांव"

"देखिये अंकल, आपको मैं पसन्द नहीं न सही लेकिन......"

"तुम हमारे फैमिली मैटर में बोलने वाले कौन होते हो, बेहतर होगा खुद से मतलब रखो" अर्चिता के पापा डांटते हुए बोले

अब रोहन क्या करता, वो चुप रह गया।
★★★★★


 "तुम चलो मेरे साथ, आज ही मैं तुम्हे तुम्हारी मौसी के यहां गुड़गाँव भेजने की व्यवस्था करता हूँ" अर्चिता के पापा उसका हाथ पकड़ के जबरदस्ती खींचकर ले जाते हुए बोले

"बहुत बोल निकलने लगे हैं तुम्हारे, यहाँ इसीलिए आई थी न तुम?" अर्चिता की माँ ने कहा

अर्चिता चुप थी लेकिन आँखों से बहते आँसू उसकी बेबसी कह रहे थे, वो बार बार बेबस निगाहों से रोहन को देख रही थी।

और रोहन, वो तो जड़ सा हो गया था, कुछ पल को उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था, उसके प्यार की दुनिया बसने से पहले ही उजड़ रही थी।

अचानक से उसने एक फैसला किया,

"मिस्टर शुक्ला, यह कंपनी का कैंपस है और यहाँ अर्चिता मेरी एम्प्लोयी है जिसके साथ आप ऐसा बिहैव नहीं कर सकते, भले ही वो आपकी बेटी ही क्यों न हो! छोड़िये इनका हाथ"

"तुम, तुम फिर से, और तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई फिर बोलने की" अर्चिता के पापा गुस्से से कांपते हुए बोले

"मुझसे कुछ गलत न हो जाए, आप इसलिए अभी अर्चिता का हाथ छोड़िये, अभी वो कहीं नहीं जायेगी।"

"बदतमीज!...." और एक तेज थप्पड़ रोहन को पड़ते-पड़ते रह गया, अर्चिता ने जीवन में पहली बार अपने पिता का हाथ यूं पकड़ा था।

"प्लीज़! प्लीज़!....आप दोनों ही शांत हो जाइये। रोहन, पापा....प्लीज़। मेरी वजह से आप दोनों यूं न लड़िये।
रोहन जी, मैं अगर आपको प्यार करती हूँ तो अपने पापा की इज़्ज़त भी मुझे प्यारी है। "

"पापा आप मुझे मौसी के पास ले जाना चाहते हैं न यहाँ से, मैं चलूँगी।"

"रोहन जी, मैं आपको भरोसा दिलाती हूँ कि मरते दम तक मेरे दिल पर, मेरी रूह और शरीर पर आपके सिवा किसी और का हक नहीं हो पायेगा। मैं आपकी छाया हूँ और छाया बिना अपने आकार के नहीं रह सकती, उसे उसके साथ रहना ही होता है, उम्मीद है आप समझ गए होंगे"

अर्चिता की आखिरी बात सुनकर और उसका अर्थ समझकर रोहन की आँखें चमक उठीं और फिर उसने कोई विरोध नहीं किया।

उसी शाम अर्चिता अपने माता-पिता के साथ गुडगाँव चली गयी।
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अब यहाँ रोहन अकेला रह गया था, बार-बार उसके दिमाग में छाया और आकार ये गूँज रहा था, लेकिन वो समझ नहीं पा रहा था कि कैसे वो अर्चिता से मिले या बात करे।

"हाँ, अपने पेपर्स में उसने नंबर जरूर लिखा होगा, लेकिन क्या पता उन लोगों ने उसका नम्बर भी बदलवा दिया हो, या कोई और फोन उठाए" "कोई नहीं, जो होगा देखा जाएगा" सोचते हुए रोहन डॉक्युमेंट्स फ़ाइल की लिस्ट में से अर्चिता की फाइल ढूंढने लगा।

"ये रही फाइल और ये उसका नम्बर"
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"हेलो"
"हेलो, कौन?"

"अर्चिता, मैं रोहन, तुम कहाँ हो, कैसी हो और....."

"रोहन......आप। मैं ठीक हूँ, मौसी के यहाँ हूँ, मैंने रिलायंस फ्रेश ज्वाइन कर लिया है, आप लेकिन यहाँ मत आइयेगा, आपको नहीं पता कि कितना खतरा है यहाँ आपके आने में"

" अर्चिता, कुछ भी हो, मुझे तुमसे मिलना है, ये बहुत जरूरी है, मैं कल आ रहा हूँ। मुझे एड्रेस बताओ"

"आप समझ नहीं रहे, यहाँ मेरे साथ भैया हैं और वो पुलिस में हैं, ये लोग आपको मार डालेंगे अगर इन्होंने देखा तो"

"मैं नहीं डरता, तुम एड्रेस बता रही हो या...."

"लेकिन मैं डरती हूँ आपको खोने से...."

"अर्चिता एड्रेस बताओ प्लीज़"

"तो आप नहीं मानेंगे, ठीक है DLF चौराहे पर मिलिएगा मुझे, रिलायंस फ्रेश पर ही, कस्टमर बन के, भैया आपको नहीं पहचानते"

"तुम चिंता मत करो, मैं कल आ रहा हूँ, बोल देना अपने भैया से, जो कर सकें कर लें"

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अब रोहन को अगले दिन की तैयारी करनी थी और यहाँ उसका कोई दोस्त नहीं था, उसे अपने डायरेक्टर के रूप में आशा की किरण दिखाई दी और वह उनसे मिलने चल पड़ा।

"रोहन! मैंने पूरी बात सुनी और समझी और मैं तुम्हें अकेले जाने की सलाह नहीं दूँगा"

"सर! मुझे सिर्फ आपकी गाड़ी चाहिए बस"

"गाड़ी तुम्हें मिल जायेगी और साथ में मैं भी चल रहा हूँ एंड दिस इज माय आर्डर"

"ओके सर! ऐज यू विश"

"सुबह 6 बजे रेडी रहना।"
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जैसा कि तय था रोहन और उसके डायरेक्टर दोनों सुबह छः बजे ही जयपुर से गुड़गांव के लिए निकल दिए।
"कैसे क्या करोगे तुम, कुछ सोचे हो?"

"अभी कुछ नहीं सर, वो शायद बिलिंग डेस्क पर होती है, कस्टमर बनके आने को बोला है"

"उसका भाई पुलिस में है, मुझे डर ही नहीं पूरा यकीन है कि वो अपने जासूस लगाया होगा"

"हो सकता है लेकिन मुझे हर हाल में उससे मिलना ही है सर"

"हाँ, इसीलिए मैं चल रहा हूँ, कुछ होने से पहले निकल लेना है, कोई लफड़ा मत करना।"

"जी सर"
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सुबह नौ बजे, DLF चौराहे पर राजस्थान की एक स्कार्पियो आकर रूकती है।
अंदर दो लड़के जिसमें एक की उम्र 27-28 और दूसरे की 35-36 है, बातें कर रहे हैं।

"स्टोर तो खुला है, तुम बहुत संभल के भी मत जाना, एकदम आराम से रिलैक्स होकर, नहीं तो उन लोगों को शक हो जाएगा।"

"जी सर, आप चिंता न करिये"

"जाओ अब"

रोहन गाड़ी से उतर कर स्टोर में जाता है, उसका अंदाजा सही था, बिलिंग डेस्क पर ही उसे अर्चिता दिखती है। वह जानबूझ कर इग्नोर करता हुआ आगे बढ़ता है और एक रैक के पास रुक कर आँखों से अर्चिता को आने का इशारा करता है।

अर्चिता भी आँखों से ही रुकने को कहती है और फिर स्टोररूम की तरफ जाती है और रोहन को पीछे आने का संकेत देती है।

दूसरी तरफ रोहन के डायरेक्टर सर स्टोर में घूमते हुए नजर रखे हुए थे।

स्टोररूम में पहुँच कर,

"क्यों आये हो यहाँ, तुम्हारी जान को खतरा है, वो लोग मार देंगे हम लोंगों को साथ देखकर, भैया के लोग बाहर ही होंगे, उनको भनक लगी तो ग़ज़ब हो जाएगा"

"जानता हूँ कि तुम पर पहरे हैं, तुमसे मिलकर बस आखिरी बार तुम्हारी इच्छा जाननी थी, इसलिए आया"

"आये हो तो एक काम करोगे, मुझे अपने साथ लेते चलो, ले चलोगे"

"बिल्कुल ले जाऊँगा, लेकिन ऐसे चोरी से भगाकर नहीं, उसदिन जब तुम्हारे घरवाले अपनी मर्जी से तुम्हारा हाथ मुझे देंगे तब"

"ऐसा शायद कभी नहीं होगा रोहन, वो लोग तुम्हें मार देंगे और साथ ही मुझे भी, तुम ये आदर्शों को ही लेके घूमते रहोगे और देर हो जायेगी, इन आदर्शों के ही चक्कर में क्या पता तुम कल को मुझे खो दो"

"ऐसा नहीं होगा, मैं तुम्हारे पापा को मनाने की फिर से कोशिश करूँगा, अरे! ये तुम्हारे गले पर ये निशान कैसा है?"

"कुछ नहीं, वो ऐसे ही चोट लग गयी थी" निशान को दुपट्टे से छुपाते हुए अर्चिता ने कहा

"तुम झूठ बोल रही हो, उन लोगों ने तुम्हें मारा है, चलो तुम अभी इसी वक्त मेरे साथ"

"तुम तो अभी मना कर रहे थे," अर्चिता रोहन को छेड़ते हुए बोली

"मैं अभी भी मना ही कर रहा हूँ, हम डॉक्टर के पास चल रहे हैं और फिर पुलिस स्टेशन"

"नहीं, इसमें मेरी और मेरे घर की बेइज्जती होगी, और भैया हरियाणा पुलिस में ही हैं तो कुछ भी नहीं होगा, उल्टे तुम ही मुश्किल में पड़ जाओगे"

"फ़िर क्या करूँ मैं, अच्छा तुम मेरे साथ चलो, सोचते हैं कुछ"

"चलो न, मैं तो कब से तैयार हूँ, लेकिन पहले तुम चलो, मैं बाद में आ जाऊँगी"

"ठीक है, सामने वाली काली स्कार्पियो में हूँ मैं, साथ में डायरेक्टर सर भी हैं"

"ठीक है, मैं आती हूँ"

रोहन बाहर की तरफ निकलता है और उसके डायरेक्टर शुभम सर से मिलता है।

शुभम: "क्या हुआ, मिले?"

रोहन : "जी सर, वो आ रही है, हम लोगों के साथ जयपुर चलेगी"

"क्या? बेटा, मरवाएगा तू, तू निकलेगा नहीं कि पुलिस तेरे पीछे पड़ जाएगी और फिर हम सब फसेंगे"

"सर, मैं उसे ऐसे नहीं छोड़ सकता, उन लोगों ने उसे मारा भी है, और फिर वो अपनी मर्ज़ी से आ रही है, मैं भगा के नहीं ले जा रहा"

"हाँ लेकिन, अगर उन लोगों ने मारा है तो इसमें अर्चिता को ये बात कहनी पड़ेगी, उसे बोलना पड़ेगा कि वो तुम्हारे साथ अपनी मर्ज़ी से आयी है, कर पाएगी वो?"

"मैं कर लूँगी सर, ये अपनी जान की परवाह किये बिना अगर यहाँ तक सिर्फ मुझसे मिलने आ सकते हैं, तो मैं अपने प्यार को बचाने के लिए कुछ भी करुँगी" अर्चिता जो कि आ चुकी थी, ने जवाब दिया

"ठीक है, तो फिर चलते हैं"

"जी सर, और अर्चिता मेरे साथ मेरे फ्लैट में रहेगी"

"हाँ, और इनकी जॉब अभी जारी होगी, as your secretary"
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"सुनो रोहन, अर्चिता का रिकॉर्ड कंपनी में सबमिट है, जॉइनिंग हो चुकी है और बिना रिजाइन किये दूसरी कंपनी ये ज्वाइन नहीं कर सकती। मेरा मतलब ये अभी भी हमारी ही कंपनी की एम्प्लोयी है।" डायरेक्टर सर रोहन से बोले।

"जी सर"

"अर्चिता, तुम्हें कोई प्रॉब्लम तो नहीं"

"जी नहीं सर, बस सोच रही इस तरह से आना क्या सही है, क्या सोचा था और लाइफ किस मोड़ पर ले आई है"

"तुम चिंता मत करो अर्चिता, तुम मेरे साथ रहोगी लेकिन उससे पहले हम शादी करेंगे फ़िर तुम्हारे पापा-मम्मी का आशीर्वाद लेने चलेंगे" रोहन ने कहा

"शादी? अभी इस हालात में, तुम्हें नहीं लगता कि हम जल्दी कर रहे हैं"

"हाँ लग रहा है, लेकिन तुम्हें क्या लगता है कि तुम्हारा भाई ऐसे में मान जाएगा, वो नहीं मानेगा, और मुझे यकीन है कि अब तक उसे पता चल गया होगा और उसने हमारे पीछे अपने लोग भी लगा दिए होंगे"

"तो फिर क्या करोगे अब"

"हम किसी मंदिर में शादी करेंगे और फिर तुम मेरे साथ रहोगी हमारे घर में"

"ठीक है, सर आप ने हमारी इतनी मदद की है, बस एक मदद और कर दीजिए, हमारी शादी करवा दीजिये कानूनन"

"कानूनन, आज तो नहीं, कल कोर्ट खुलेगा तो मैरिज रजिस्ट्रार के पास चलेंगे"

"ओके थैंक यू सर।"
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रोहन और अर्चिता जयपुर पहुँच चुके थे और इस वक्त शाम के सात बज रहे थे,
उधर गुड़गांव में, अर्चिता का भाई अर्चिता के न आने से परेशान था और उसके शक की सुई बार बार रोहन पे ही रूकती थी। आखिरकर इंतज़ार करते करते जब नौ बज गए तो उसने छान-बीन करने की ठानी।
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इधर अर्चिता और रोहन शादी की तैयारी में लगे हुए थे। अगले सुबह ही दोनों मंदिर में शादी करने वाले थे और उसके बाद कोर्ट जाकर कोर्ट मैरिज।
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अर्चिता और रोहन की शादी फाइनली हो गई औऱ कोर्ट मैरिज के बाद मैरिज रजिस्टर भी हो गयी जिसकी गवाही डायरेक्टर सर और कुछ कंपनी स्टाफ ने दी थी।

अब अर्चिता दुल्हन बन कर रोहन के फ्लैट में आ चुकी थी।

"अर्चिता, मैंने कभी ऐसे नहीं सोचा था, चाहता था कि ......"

"ये होंठ बहुत बोलते हैं...." अर्चिता ने ये कह कर रोहन के होंठ बंद कर दिए

दूर कहीं गीत बज रहा था....

"लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो, शायद फिर इस जनम में मुलाक़ात हो न हो"

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इधर पुलिस की टीम रोहन और अर्चिता की तलाश में भटक रही थी, और अर्चिता का भाई बार बार जयपुर के बारे में सोच रहा था, और अन्त में उसने रोहन के यहाँ जाकर देखने की ठान ली।

"ये मुलाक़ात मैं अकेले ही करूँगा, अगर वहाँ अर्चिता होगी और उसने कुछ उल्टा सीधा बयान दे दिया तो मुश्किल हो जायेगी। हो, न हो मेरा मन कहता है कि अर्चिता भी वहीं है।"

ये सोचकर वो जयपुर के लिए निकल पड़ा।

जयपुर पहुँच कर उसने पीसीओ से अर्चिता को फोन किया।

"हेल्लो कौन?, कोई बोलता क्यों नहीं"

"कौन है अर्चि,"

"पता नही कौन है, फोन किया है लेकिन बोल नहीं रहा"

"फोन रखो, जल्दी, ये पुलिस भी हो सकती है।"

"तो अब क्या करें, "

"कुछ नहीं, हम क़ानूनन शादीशुदा हैं, हम बालिग़ है और विवाहित भी, हमने अपनी मर्ज़ी से शादी जरूर की है लेकिन कोई अपराध नहीं किया है, इसलिए पुलिस भी हमारा कुछ नहीं कर सकती"

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दो घंटे बाद,

ठक... ठक.... ठक

"कौन है?"

"दरवाज़ा खोलो"

"अरे भैया आप?"

"ओह, तो तुम यहीं हो, मेरा शक सही निकला, औऱ ये सिन्दूर, चूड़ी और मंगलसूत्र ये सब क्या है?"

"ये शादी की निशानी है भाई साहब, और हम सब इसके गवाह हैं, लीजिये मिठाई खाइये और अपनी बहन को आशीर्वाद दीजिये" रोहन के पूरे ऑफिस स्टाफ ने एक साथ कहा।

"शादी?? कब, कैसे, किससे???"

"तुमने रोहन से शादी भी कर ली, बिना माँ-पापा को बताए, "

अब अर्चिता के भाई के पुलिसिया दिमाग में साजिश तैरनी शुरू हो चुकी थी।
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 अर्चिता के भाई ने हाथ में लड्डू लेते हुए कहा, "अब जब तुम लोगों ने कोर्ट मैरिज कर ही ली है और जैसा कि तुम दोनों बालिग हो तो फिर पुलिस भी कुछ नहीं कर सकती है। तुम दोनों को शादी मुबारक!"

फिर वह रोहन को मुख़ातिब होते हुए बोला, "रोहन, देख तूने मेरी बहन से शादी तो कर ली है लेकिन मैं तुझे जीजा जी तो नहीं बोलूँगा। अब ये शादी ऐसे माहौल में हुई है तो घर पर सब परेशान हैं। मेरी तुमसे गुज़ारिश है कि ऐसे में अर्चिता को एक बार मेरे साथ घर जाने दो, माँ से मिलकर चली आएगी।"

अर्चिता अपने भाई के इस बदले हुए व्यवहार पे आश्चर्यचकित थी। वो सोच रही थी कि जरूर ये भैया की कोई पुलिसिया चाल है।

रोहन: जी भैया, मुझसे पहले आप लोगों का हक है अर्चिता पर। आप इन्हें ले जा सकते हैं लेकिन जल्दी वापस भेजिएगा।

अर्चिता: मगर भैया, आप मम्मी-पापा को यहीं बुला दीजिये न, वो लोग मेरे साथ ही रोहन से भी मिल लेंगे।

"अर्चि! माँ इस हालत में नहीं कि वो आ सकें; नहीं तो मैं उन्हें जरूर लाता। तेरा मन नहीं है तो मत चल, मरने दे बूढ़ी माँ को यूँ ही"

अर्चिता: ठीक है भैया, ऐसा मत बोलिये। माँ की तबियत खराब है तो मैं चलूँगी लेकिन सिर्फ माँ के लिए। फिलहाल  अभी रात बहुत हो गई है, हम कल चलेंगे।
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अगले दिन,

अर्चिता अपने भाई के साथ अपनी मौसी के यहाँ गुड़गांव चली गई।

रोहन अब अपने ऑफिस के काम में उलझा रहता। शुरुआती दो तीन दिन फोन पर अर्चिता से बातें हुईं तो सब ठीक लगा। अर्चिता ने रोहन को अपनी मौसेरी बहन श्वेता के बारे में बताया और कहा कि अगर कुछ भी होगा तो सारी खबर श्वेता आपको देती रहेगी।

फिर अचानक एक दिन अर्चिता ने बताया कि वो अपने मम्मी-पापा के साथ गोरखपुर जा रही है।

इस के बाद अर्चिता के फोन आने बन्द हो गए, रोहन जब भी कॉल करता नम्बर स्विच ऑफ ही आता। घर के नम्बर पर कॉल करने पर कोई फोन ही रिसीव नहीं करता। ऐसा जब लगातार 4-5 दिनों तक चलता रहा तो रोहन बहुत परेशान हुआ और उसने अर्चिता का पता लगाने की कोशिश शुरू कर दी।
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अगले दिन वह गुडगांव अर्चिता की मौसी के यहाँ पहुँच गया, वहाँ उसे पता चला कि अर्चिता के माँ-पापा भी आये थे और वे उसे गोरखपुर ले गए हैं।

अर्चिता की मौसेरी बहन श्वेता जिसे अर्चिता-रोहन के बारे में सब पता था उसने रोहन को बताया कि अर्चिता के पापा और भाई उसकी शादी किसी आर्मी वाले से करवाने जा रहे।

रोहन: नहीं श्वेता, मैं ऐसा नहीं होने दे सकता। तुम मुझे गोरखपुर का एड्रेस दो, मुझे जल्द से जल्द वहाँ पहुँचना है।

श्वेता: जीजू, मुझे कुछ गड़बड़ लग रही है। आप वहाँ अकेले मत जाइयेगा, वहाँ आप के लिए खतरा हो सकता है।

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श्वेता से अर्चिता के घर का पता लेकर रोहन तुरंत मार्केट गया, कुछ फुटपाथ वाले सस्ते कपड़े, एक हवाई चप्पल लिए और अपने दो दोस्तों को साथ लेकर वो निकल पड़ा अर्चिता के घर, गोरखपुर की ओर।

अगली रात गोरखपुर पहुँचकर रोहन, और उसके दो दोस्त विक्रम और अमित तीनों ने स्टेशन के पास ही एक होटल में रूम लिया।

अगले दिन,

रोहन: अमित, तुम एक ठेले का जुगाड़ करो। मैं और विक्रम कुछ ताजी सब्जियाँ लाते हैं।

अमित: प्लान क्या है?? जाना कहाँ है? कुछ तो बता...पूरे रास्ते भर खामोश रहा है तू

रोहन: जाना है राप्ती पार, बड़हलगंज। अर्चिता की शादी कर रहे उसके घर वाले....और कल ही मेहंदी है शायद।

मुझे उससे पहले एक बार, सिर्फ एक बार अर्चिता से मिलना है।

अब प्लान सुनो, मैं सब्जी वाला बन के उसके घर तक जाऊँगा। तुम दोनों टेंट वाले बनकर आओगे। किसी भी तरह या तो घर में इंट्री लेनी है या फिर अर्चिता को बाहर लाना है।

विक्रम: और अगर कुछ लोचा हुआ तो??

रोहन, अमित: तो साथ झेलेंगे।
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प्लान के मुताबिक दोपहर से पहले तीनों अर्चिता के घर के बाहर थे। शादी का माहौल था, घर सजा हुआ था।

रोहन (सोचते हुए): इसका मतलब श्वेता सही कह रही थी। कोई सेक्योरिटी तो नहीं दिख रही लेकिन कैसे जाऊँ मैं अंदर! कुछ तो करना होगा।

रोहन सोच ही रहा था कि अचानक उसे श्वेता बाहर आती दिखी।

रोहन: अजी सुनिए

श्वेता: हटो, हमें सब्जी नहीं चाहिए

रोहन: श्वेता जी, हम सब्जी वाले नहीं, रोहन हैं।

श्वेता: रो...हन! तुम...

रोहन: धीरे...हाँ मैं, मुझे अर्चिता से मिलना है कैसे भी करके। तुम कुछ हेल्प करोगी???

श्वेता: हेल्प, मैं?? मैं कैसे??

रोहन: कुछ सोचो, ये उसकी औऱ मेरी जिंदगी का सवाल है

श्वेता: उम्म...वो पार्लर के लिए निकलेगी, तब कोशिश करती हूँ। लेकिन ध्यान रहे किसी को पता न चले

रोहन: स्मार्ट मूव, थैंक्स। किसी को पता नहीं चलेगा।

रोहन: जब तक श्वेता आती है, मैं विक्रम और अमित को अंदर भेजता हूँ। देखें अंदर क्या माहौल है! वो दोनों अंदर जाकर देखेंगे कहीं कोई खतरा तो नहीं।

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आधे घण्टे बाद श्वेता, अर्चिता को साथ लेकर स्कूटी से निकली। जैसा कि तय था, पार्लर के आगे के चौराहे के पास रोहन उनका इंतजार कर रहा था।

अर्चिता को देखा रोहन ने, इतने ही दिनों में वो बिल्कुल बीमार सी लग रही थी। ऐसी जैसे बेजान हो।

रोहन उसे देखकर सब समझ गया कि उसकी पत्नी के साथ कुछ तो बुरा हुआ है और उसने अर्चिता को बीच सड़क में ही गले लगा लिया।

रोहन के गले लगते ही अर्चिता रो पड़ी, और फिर उसने वो सच बताया कि रोहन की मुट्ठियाँ भिंच गईं।

अर्चिता: रोहन, मुझे ले चलो अभी। तुम नहीं जानते मुझ पर क्या बीती है?

गुड़गांव से आने के बाद मुझे एक कमरे में बंद कर दिया गया और चार दिनों तक खाना नहीं दिया गया। मेरी मर्जी के बिना मेरी शादी किसी आर्मी के अफसर से तय कर दी गई, मना करने पर भाई ने मुझे बेल्ट से जी भर मारा। ताज़्ज़ुब ये कि ये सब माँ के सामने होता रहा औऱ वो कुछ न बोली, वो माँ जिसने मुझे पैदा किया है।

अगले दिन, मैंने साफ बोल दिया कि मेरी शादी हो चुकी है और ये कानूनन गलत है, इस पर मुझे सीढ़ियों से धक्का दे दिया गया रोहन...हाँ किस्मत थी कि सिर्फ सर पे चोट आई। भाई किसी कानून को नहीं मानता और माँ-पापा सिर्फ उसकी सुनते हैं।

रोहन: इतना सब हो गया और मुझे कुछ नहीं बताया तुमने। समझता हूँ मैं, उन लोगों ने तुम्हारा फोन भी ले लिया होगा। लेकिन तुम घबराओ नहीं....अभी मुझे तुरन्त लखनऊ जाना होगा, अपने और साथियों को लाने। तब तक तुम मेरा इंतज़ार करना
मेरे दो दोस्त इसी शहर में रहेंगे, वो तुम्हारी खबर मुझे देते रहेंगे।

अर्चिता: समय बहुत कम है रोहन, मैं हर हाल में तुम्हारा इंतज़ार करूँगी। जल्दी आना

रोहन: मैं जरूर आऊँगा तुम्हें लेने। श्वेता तुम अर्चि को ले जाओ और इसका ख्याल रखना। इस घर में तुम ही हो जिस पर मुझे भरोसा है। तुम जब तक यहाँ हो, मुझे खबर देती रहना।

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अब आगे रोहन क्या करेगा???
क्या उसका प्लान कामयाब होगा??
विक्रम और रोहित घर के अंदर क्या कर रहे हैं और क्या वो पकड़े जायेंगे या बच जायेंगे??
श्वेता क्या रोहन के भरोसे को बनाये रखेगी???

आगे क्या होगा??

ये सब जानने के लिए पढ़ते रहिये मुझे यानी NeeRaj K. Gupta को
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अगला अंक दो-तीन दिनों में

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