शकारि विक्रमादित्य

【शकारि विक्रमादित्य】
★★★★★★★★★★

विन्ध्य पर्वत की उपत्यकाओं में नाद करती रेवा के समीप एक अत्यंत गहन वनप्रांत में एक अश्वारोही तीव्र वेग से चला जा रहा था। उसे शीघ्रता थी महाकाल की नगरी अवन्तिकापुरी पहुँचने की।

यह वह समय था जब अवन्तिका नगरी पर परमारवंशीय महाराज विक्रमादित्य का शासन था।

सिंध, पंचनद और राजस्थान को रौंदती हुई विध्वंसक और क्रूर शकों की सेना अनियंत्रित गजों की भाँति मालव-प्रांत की ओर बढ़ी आ रही थी, और यही उस अश्वारोही की चिंता थी। उसे शीघ्र ही यह सूचना महाराज को देनी थी। उसे दिन ढलने से पूर्व ही अवन्तिका नगरी में पहुँचना था।

उन दिनों अवन्तिका, उत्तर भारत और दक्षिण भारत के मध्य का सेतु था। पवित्र शिप्रा के तट पर बसी भगवान महाकाल की यह नगरी युगों से धार्मिक आस्था, संस्कृति, ज्ञान और विज्ञान का केंद्र थी। इसके अतिरिक्त शक्तिपीठ माँ हरसिद्धि का स्थान और महाकाली का जाग्रत स्थान गढ़कालिका इस नगरी को अभूतपूर्व धार्मिक केंद्र बनाते थे।

इस प्राचीन नगरी के नरपति थे मालवनरेश महाराज वीर विक्रमादित्य, और वह अश्वारोही कोई और नहीं वरन महाराज के नवरत्नों में से एक, गुप्तचर संस्था का प्रमुख "क्षपणक" था।

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भारत के वायव्य दिशा में बैक्ट्रिया नामक ग्रीकों का प्रदेश था, जिसके ठीक उत्तर में शक रहा करते थे जिनको साइथियन्स नाम से जाना जाता था। उनके नजदीक कुषाण (कुए-शंग) नामक कबीले की संस्कृति वाले लोगो का प्रान्त था। कुषाणों के पड़ोसी हूणों ने कुषाणों पर आक्रमण कर उनका प्रदेश छीन लिया, जिस वजह से कुषाणों को अपने पडोसी शकों पर हमला कर उनका प्रदेश छीनना पड़ा।

कुषाणों द्वारा शकों को भगाए जाने पर शकों ने नए स्थान के शोध में बैक्ट्रिया के ग्रीकों पर हमला बोल दिया। जंगली, क्रूर, संख्या में अत्यधिक, विध्वंसक शकों के आगे ग्रीकों की कुछ ना चली और ग्रीक समाज पूरी तरह से तहस नहस हो गया।

यहीं से ग्रीकों का सम्पूर्ण वंश समाप्त होता है, केवल वो ग्रीक बचे जिन्होंने भागकर भारत में शरण ली, या वे जो एलेक्जेंडर के समय से भारत में रह गए थे।

भले ही शकों ने बैक्ट्रिया को जीता हो पर कुषाणों से पीछा अभी छूटा नहीं था , कुषाण जाति ने पुनः शकों के बैक्ट्रिया प्रांत पर हमला किया और उन्हें फिर वहाँ से भी खदेड़ दिया (कुषाणों पर हूणों के बार-बार आक्रमणों का दबाव बना रहता था)। अब शकों के पास खुद को बचाने के लिए भारत पर हमला करने के अलावा और कोई चारा नहीं था, सो शकों ने अपनी पूरी शक्ति के साथ भारत पर  आक्रमण करने की सोची।

विध्वंसक शकों के आगे महाजनपदों में विभाजित भारत के छोटे-छोटे गणों की एक ना चली और धड़ाधड़ ताश के पत्तों की तरह राजसत्तायें बिखरने लगीं। पश्चिम से बढ़ती ये आँधी राजस्थान, गुजरात, सिंध, पंजाब पर देखते ही देखते छा गयी और इसके बाद बर्बर शकों ने दक्षिण भारत पर हमले के लिए कूच किया।

लेकिन इसी समय इतिहास के पटल पर एक शक्तिशाली और अभूतपूर्व राजा का प्रादुर्भाव हुआ, मालवपति गंधर्वसेन पुत्र विक्रमादित्य !!!

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रात्रि का द्वितीय प्रहर, जब गुप्तचर संस्था के प्रमुख क्षपणक ने राज्य में प्रवेश किया और नगर के मुख्य-द्वार पर पहुँचे और अपना राजकीय चिन्ह दिखाकर अपना परिचय दिया।

प्रहरी: महामन्त, आप इस समय! पधारें।

क्षपणक: हमें शीघ्र ही महामात्य शंकु से भेंट करनी है। मार्ग दो!

★★★★★★★

[महामात्य शंकु का कक्ष]

"यह तो विकट समस्या है महामन्त, हमें महाराज को सूचित करने के साथ ही सभी विभागाध्यक्षों और सामंतों की सभा आहूत करनी होगी, वो भी तत्काल" महामात्य शंकु ने सुझाव दिया।

"अवश्य महामात्य! विचार अत्युत्तम है। कार्य अत्यधिक है और समय कम"

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महाराज विक्रमादित्य का कक्ष, राजकीय वेशभूषा धारण किये हुए एक बलिष्ठ युवक मंदस्मित हास्य के साथ दो वरिष्ठ जनों से वार्ता कर रहा था।

वह बलिष्ठ युवक थे सम्राट विक्रमादित्य और वे दो वरिष्ठ जन थे नवरत्नों में से दो रत्न, "महामात्य शंकु" और " महामन्त क्षपणक"

"तो शकों ने पंचनद, राजस्थान और गुर्जर प्रदेश पर अधिकार कर लिया है और वे तीव्रता से सौराष्ट्र औऱ मालव-प्रांत की ओर बढ़ रहे हैं। महामन्त क्षपणक क्या अन्य कोई सूचना?"

" जी महाराज! वे अत्यंत क्रूर हैं, युद्ध के नियमों को नहीं मानते और वीभत्स हैं। उनका मुख्य अस्त्र "चक्रिक" है जो एक घूमती आरी सा अस्त्र है जिसे फेंका भी जा सकता है।"

"ठीक है, तो आप तत्काल सभा बुलाइये, शेष चर्चाएं वहीं होंगी किन्तु सभा में हम तीनों के अतिरिक्त मात्र  सेनापति अपिलक, अमरसिंह जी, वराहमिहिर जी, धन्वन्तरि जी, महाकवि कालिदास और तंत्रप्रमुख वेतालभट्ट जी को ही आमंत्रित किया जाए"

"जो आज्ञा महाराज"

★★★ ★★★ ★ ★★

"महाराज! मेरी सूचना के अनुसार इस समय मथुरा पर शकों का आधिपत्य है, वहाँ का शासक शोडास है और सेनापति उसका अनुजपुत्र खारोस। उनके पास एक विशाल सैन्यबल है जिसकी प्रमुख शक्ति उनकी तीव्रता है। हमें उनको युद्ध में परास्त करना होगा। सीधे युद्ध में हमारे पास अभी सैन्यबल पर्याप्त नहीं है, अतः हमें सर्वप्रथम सैन्यबल विस्तार करना होगा।" सेनापति अपिलक ने कहा

"किन्तु एक अड़चन और है सेनापति"

"मैं आपका मंतव्य समझ गया अमरसिंह जी! युद्ध होने पर शोषाद की सहायता के लिए गुर्जर प्रांत का शकराज भुमुक और पंचनद प्रदेश का शकराज कुशुलुक भी शोषाद की सहायता हेतु अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ आयेंगे।" सेनापति अपिलक ने कहा

अब महामात्य शंकु बोलने के लिए उठे, " महाराज! मेरा विचार है कि इस महायुद्ध के लिए हमें एक संघ का निर्माण करना चाहिए जिसमें मित्र गणराज्यों को भी शामिल करना चाहिए। इसके अतिरिक्त हमें अपनी सैन्य-शक्ति का भी विस्तार करना चाहिए।"

"हमने सभी के विचार सुने, समझे। सभी के विचार अत्युत्तम हैं और हम इन पर कार्य भी करेंगे। हम हमने मित्रों, क्रमशः सौवीर गणराज्य के युवराज प्रद्युम्न, कुनिंद्य गणराज्य के युवराज भद्रबाहु और वैशाली महाजनपद के युवराज अमरगुप्त के साथ एक संघ की स्थापना करेंगे जो कि युद्ध के समय गुर्जर शकराज और पंचनद शकराज को आगे बढ़ने से रोक देंगे।

इसके अतिरिक्त सैन्यबल के विस्तार हेतु हमारे पास एक योजना है। " महाराज विक्रमादित्य ने कहा

"हम तंत्र-आचार्य वेतालभट्ट के नेतृत्व में एक भैरव-सेना का गठन करेंगे" महाराज ने आगे कहा

"भैरव सेना????" सबने समवेत आश्चर्यमिश्रित स्वर में कहा

"हाँ, भैरव सेना! जो तंत्रविद्या और अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग में पारंगत हों, विशेषतः परिघ और त्रिशूल के प्रयोग का! इस कार्य में विन्ध्य-क्षेत्र का सघन वनीय क्षेत्र हमारी सहायता करेगा।"

"महामंत क्षपणक, आप अपनी गुप्तचर सेना की सहायता से राज्य की परिधि में आने वाले उन युवाओं की सूची बनाइये जो इस भैरव सेना में शामिल हो सकते हों किन्तु इस सेना के विषय में किसी को ज्ञात न हो"

"जो आज्ञा महाराज''

★★★★★★★★★★★

अब सर्वप्रथम कार्य सुदृढ सैन्यबल का निर्माण और उसका प्रशिक्षण था। इस हेतु राज्य के प्रत्येक ग्राम के शिवमंदिरों पर युवाओं को एकत्र किया जाने लगा  और प्रत्येक को एक त्रिशूल देकर भैरव रूप में दीक्षित किया जाने लगा, और उनका प्रशिक्षण विन्ध्य की गहन उपत्यकाओं में छिपे सघन वनक्षेत्र में होने लगा। दिन में सेनापति अपिलक जहाँ उन्हें शस्त्रों का प्रशिक्षण देते वहीं रात्रि में तंत्र-आचार्य वेतालभट्ट उन्हें तंत्रिकीय क्रियाएं और सिद्धियाँ समझाते। इस कार्य में वनीय क्षेत्र अत्यंत सहायक था इसीलिए इतनी बड़ी घटना की खबर शकों तक न पहुँच पाई और देखते ही देखते पाँच ही माह में भैरव सैनिकों की संख्या लगभग ६० सहस्त्र हो गई।

उधर महाराज विक्रमादित्य को अपने संघ में एक नया सहयोगी प्राप्त हुआ, आंध्र के महाराज शिवमुख, जो कि सेनापति अपिलक के मौसेरे भाई भी थे।

★★★★★★★★★

मथुरा का शक-शासक शोडास और सेनापति खारोस अब दक्षिण-विजय की योजना बना रहे थे। मालवप्रान्त उत्तर और दक्षिण की संयोजक कड़ी का कार्य करता था और बिना मालवा को विजित किये आगे सुदूर दक्षिण की ओर बढ़ना असम्भव था।

वह वर्ष था उज्जैन के सिंहस्थ महाकुंभ का, जहाँ आस्था का महासंगम लगने वाला था। भारतभूमि के कोने-कोने से श्रद्धावान जन उज्जयिनी की ओर आ रहे थे। नगर इस महापर्व पर सभी आस्थावानों के स्वागत हेतु उत्सुक था।

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पूर्णिमा की रात्रि के निशीथ का चन्द्र अपने पूर्ण यौवन पर था, सम्पूर्ण जगत निद्रा के वशीभूत शयन में निमग्न था किन्तु दो व्यक्ति ऐसे थे जिनके नेत्रों में नींद नहीं थी।

नियति जब व्यक्ति के आगत का निर्धारण करती है तो प्रकृति की प्रक्रिया भी उसी भाँति चलायमान हो जाती है, विभिन्न प्रक्रम इस प्रकार घटित होने लगते हैं कि जैसे प्रतीत होता है सबकुछ वही जो रहा हो जो सोचा गया था। नियति की इस विचित्रता को कोई नहीं समझ पाता।

अवन्तिका से दूर कहीं मथुरा के राजप्रासाद में बैठा शोडास महाकुंभ को एक योजना की तरह देख रहा था, उसका मानना था कि उसे मालवा पर आक्रमण करने का इससे अच्छा अवसर नहीं मिलेगा और वह इस अवसर की ताक में था कि कब महाकुंभ का प्रथम स्नान हो और कब युद्ध का प्रारम्भ हो!

वहीं दूसरी तरफ उज्जयिनी में महाराज विक्रमादित्य के मष्तिष्क में भी एक योजना आकार ले रही थी।

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ऊषाकाल का समय और महामात्य शंकु के कुटीर के सम्मुख एक रथ रुकता है, रथ से महाराज विक्रमादित्य उतरते हैं और कुटीर में प्रवेश करते हैं।

महामात्य प्रातःकालीन सूर्योपासना में निमग्न थे अतः महाराज ने प्रतीक्षा करना उचित समझा।

उपासना पूर्ण करने के बाद,

महामात्य शंकु: महाराज कहिये, किस हेतु आपका आगमन यहाँ हुआ??

"महामात्य, बात ही ऐसी थी कि हमें स्वयं आना पड़ा। सूचना मिली है कि मथुरा का शकराज सिंहस्थ के अवसर पर मालवा पर आक्रमण की योजना बना रहा है, इस आक्रमण को विफल करने के लिए हमारे पास एक योजना है जिसपर चर्चा करने के उद्देश्य से हम आपके पास आये हैं।''

" अवश्य महाराज! कृपया योजना के विषय में स्पष्ट करने हेतु मेरी केंद्रीय कार्यशाला में चलें"

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महामात्य की कार्यशाला पूर्णतः वैज्ञानिक थी, जिसमें अवन्तिका नगरी का एक प्रारूप भी बना था। 

"महामात्य! हमारी भैरव सेना का प्रशिक्षण अब लगभग पूर्ण हो चुका है, मेरी योजना है कि सिंहस्थ के समय ही सभी भैरव-सैनिकों को साधुवेष में महाकुंभ क्षेत्र में प्रवेश करवा दिया जाए, राजकीय सैनिकों के दो दल बनाये जाएं जिसमें से एक का नेतृत्व सेनापति अपिलक करें और दूसरे दल का स्वयं मैं।

प्रथम दल क्षिप्रा के उस पार महाश्मशान में गुप्त-अवस्था में बैठे और द्वितीय दल के साथ मैं नगर की उत्तरी सीमा पर रहूँगा। शक-सेना यदि मथुरा से प्रयाण करेगी तो प्रथम भेंट मुझसे करेगी। जैसा कि सूचना ये भी है कि शकों का एक जत्था महाकुंभ में छद्मवेश में भी आएगा, तो उससे निपटने के लिए भैरव-सेना है ही!"

"इसके अतिरिक्त हमारे गुप्तचरों का एक दल शक-सेना में गुप्तरूप से शामिल हो चुका है जो प्रत्येक क्षण की सूचना हम तक पहुँचाता रहेगा।" महाराज ने सूचित किया।

" उत्तम, अति उत्तम! किन्तु महाराज भैरव सेना का नेतृत्व कौन करेगा?? इसके अतिरिक्त शकों के वेगवान अश्वों के लिए क्या प्रबन्ध हैं???"

" भैरव सेना का नेतृत्व अमरसिंह जी और तंत्राचार्य वेतालभट्ट करेंगे, इसके अतिरिक्त उत्तम कोटि के लौह से निर्मित अत्यंत हल्के दण्ड वाले भाले और द्विचीर तलवारें (जिसके दोनों सिरों पर आरीनुमा दाँत बने होते थे, जिसके एक प्रहार से शत्रु दो भागों में विखंडित हो जाता था) भी निर्मित कराई गई हैं।

शक सेना अपने वेग और क्रूरता हेतु जानी जाती है तो हम उनको भ्रमित कर शाल्व-वन तक ले जाएंगे, जहाँ की लवणीय दलदली भूमि उनको अपने भीतर समाहित कर लेगी। इसके अतिरिक्त गज-सेना तो है ही!"

"अत्यंत कूटनीतिक तरीके से आपने योजना बनाई है महाराज! इसके अनुपालन हेतु सभी को आवश्यक निर्देश दे दिए जाएं। मेरी पूर्ण सहमति है, और आशा है अन्य सदस्य भी सहमत ही होंगे"

"महामंत क्षपणक का एक सुझाव और है महामात्य!"

"कहें महाराज!"

"उनका सुझाव है कि शक सेना को नगर के भीतर आने दिया जाए और फिर दोतरफा आक्रमण के मध्य उनका विनाश कर दिया जाए। भीतर का चक्र भैरवसेना देखे और बाहर का चक्र राजकीय सेना"

"सुझाव ये भी उत्तम है महाराज किन्तु तनिक घातक है, तनिक भी असावधानी से भगदड़ मच जाएगी, इसलिए आवश्यक है कि एक भी शक पवित्रभूमि तक न पहुँच सके"

"निश्चित ही महामात्य शंकु!"

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अगले कुछ दिनों के भीतर भैरव-सेना महाकुंभ स्थल के चारों ओर बने विभिन्न कुटीरों में साधुवेश में पहुँच गई। अमरसिंह जी एक व्यापारी के वेश में जबकि तंत्राचार्य एक ब्राह्मण के वेश में घूम-घूम कर सूचनाएं एकत्र करते औऱ महामंत क्षपणक ने गुप्तचर-तंत्र को विशेष निर्देश दे रखे थे। नगर में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह कोई भी हो को कठोर त्रिस्तरीय जाँच के उपरांत ही प्रवेश मिल रहा था।

उधर शोडास ने अपनी विशाल सेना के साथ गंगा के उस पार डेरा डाल रखा था और उचित अवसर की प्रतीक्षा में था।

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संध्या काल की वेला, रात की नीरवता धीरे-धीरे अपने पैर पसार रही थी। यह समय था सम्राट का गुप्त वेश में अपनी प्रजा के बीच जाकर उनका हाल-चाल लेने का।

एक बलिष्ठ श्रमिक युवक गढ़कालिका मन्दिर की ओर तेजी से जा रहा था, मन्दिर की सीढियाँ चढ़ने के पश्चात ज्यों ही बलि-स्थान पर पहुँचा कि एक मधुर कंठ की स्वर-लहरी ने उसे रोक दिया। एक पाषाण-स्तम्भ के पीछे छुपकर वह मंत्रमुग्ध सा सुनने लगा।

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"खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघांछूलं भुशुण्डीम् शिरः
शंखम् संदधतीं करैस्त्रीनयनां सर्वाङ्गभूषावृतां।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकाम् सेवे महाकालिकाम्
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुम् कैटभम् ।।"

स्वर उत्तरोत्तर तीव्र होता जा रहा था, श्रमिक युवक अभी भी प्रस्तर-स्तम्भ के पीछे छुपा हुआ था।

स्तोत्र अभी चल रहा था।

"ॐ अक्षस्त्रक्परशुं गदेषुकुलिशम् पद्यं धनुषकुण्डिकाम्
दंडम् शक्तिमसिं च चर्म जलजं घंटां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीम् हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमह महालक्ष्मीम् सरोजस्थितां।।"

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स्तोत्र समाप्त हुआ और अचानक ही श्रमिक युवक प्रस्तर-स्तम्भ के पीछे से निकल कर भगवती के सम्मुख हाथ जोड़ कर जा खड़ा हुआ।

स्तोत्रकर्ता को सहसा विश्वास नहीं हुआ और इससे पूर्व कि वह कुछ बोलता, युवक ने मौन रहने का संकेत किया और प्रार्थना प्रारम्भ की।

" हे देवि! आप ही स्वाहा, स्वधा और वषट्कार हैं। स्वर भी आपके ही स्वरूप हैं। आप ही जीवनदायिनी सुधा हैं। आप ही नित्य अक्षर प्रणव में अकार, उकार, मकार -- इन मात्राओं के रूप में स्थित हैं तथा इन तीन मात्राओं के अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है, वह भी आप ही हो। आप ही इस जगत की उत्पत्ति, स्थिति और संहारक शक्ति हैं; आप ही महामाया, महामेधा, महास्मृति और महामोहस्वरूपा हैं।

दारुण कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी आप ही हैं।
हे देवि! राष्ट्र संकट में है, सीमा पर शत्रु घात लगाए बैठा है। माँ, मुझे शक्ति दो कि मैं आपकी कृपा से शत्रु-दल का संहार कर पाऊँ, दया करो माँ! दया करो"

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~महाराज विक्रमादित्य आप इस वेला में यहाँ?

~हाँ, महाकवि! आपसे परामर्श हेतु आया हूँ। जैसा कि आपको ज्ञात है कि शत्रु सेना त्रिपथगा गंगा के उस पार तक पहुँच गई है किंतु सूचना यह भी है कि शक-सैनिक साधुवेश में कुंभ महोत्सव में भी शामिल होंगे और अवसर का लाभ उठाकर आक्रमण करेंगे।

~आपकी योजना क्या है सम्राट?? महाकवि कालिदास गम्भीर होते हुए बोले

महाराज ने महामात्य द्वारा अनुमोदित योजना के संदर्भ में महाकवि को बताया।

~ महाराज योजना अत्यंत उत्तम है किंतु यदि शोडास की सहायता हेतु गुर्जर शकराज भुमुक ने दक्षिण से आक्रमण किया तो उस स्थिति के लिए क्या कोई योजना है????

~ जी महाकवि! इस विषय में भी हमने मंथन किया है, हमारी सेना की एक टुकड़ी सौवीर गणराज्य के युवराज प्रद्युम्न और कुनिंद्य गणराज्य के युवराज भद्रबाहु की सम्मिलित सेना के साथ उनका प्रतिरोध करेगी।

~ और हमारी उस टुकड़ी का नेतृत्व मैं स्वयं करना चाहता हूँ महाराज!

~आपकी युद्धक क्षमता पर हमें पूर्ण विश्वास है महाकवि किन्तु.....
~ महाराज! ये हमारा निवेदन है

~ ठीक है महाकवि। जैसी आपकी इच्छा! अभी आज्ञा दें, प्रातःकाल पुनः सभा में भेंट होगी।

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उधर शोडास की शक सेना के सम्मुख प्रश्न था कि गंगा की वेगवती लहरों को पार कर कैसे इस पार पहुँचें? अब तक जितने भी प्रयास किये गए सभी असफल सिद्ध हुए थे। शोडास विचारमग्न था कि अचानक उसके मष्तिष्क में एक विचार कौंधा।

"नायक! जल्द से जल्द मुझे कम से कम 100 विशाल नौकाएं बना कर दी जायें, मैं इस नदी पर नौकाओं का पुल बनाऊंगा और उसके बाद हमारी सेना उस पार होगी।"

"जो हुक्म शाह!"

"याद रखना तुम्हारे पास मात्र 4 दिन हैं।"

"जी शाह, काम हो जाएगा"

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इधर सेना के दो भाग किये गए और दूसरे भाग के पुनः दो भाग करके एक भाग को महाकवि कालिदास के नेतृत्व में राज्य की दक्षिण सीमा पर भेज दिया गया।

प्रथम भाग जिसका नेतृत्व महाराज स्वयं कर रहे थे वह राज्य के उत्तर भाग के सघन वन क्षेत्र में फैल चुकी थी और द्वितीय भाग सेनापति अपिलक के नेतृत्व में महाश्मशान में फैल चुकी थी।
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नौकाएं तैयार हो चुकी थीं और उनको बाँधकर पुल बनाने में आगे आया स्वयं शोडास, शोडास दैत्याकार शक था जो लगभग 7 फीट लम्बा था, और उसके चेहरे पर बना चोट का निशान उसे और भी अधिक वीभत्स बनाता था।

अगले दो पहर में देखते ही देखते पुल का निर्माण पूर्ण हो चुका था और शक सेना अत्यंत हर्षित स्वर में नाद कर रही थी। अब तैयारी थी उस पार उतरने की

और उस पार प्रतीक्षा में थे स्वयं महाराज विक्रमादित्य!

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उज्जयिनी नगरी आज नित्यप्रति से भिन्न दिख रही थी, राजाधिराज महाकालेश्वर के मंदिर से लेकर माता हरिसिद्धि के मन्दिर तक का समूचा प्रांगण पुष्पों से शोभायमान था। कारण था कि आज महाराज विक्रमादित्य युद्ध पर जाने से पूर्व स्वयं महाकाल का अभिषेक करने वाले थे और माँ हरिसिद्धि के प्रांगण में शस्त्रपूजन का कार्यक्रम था। समस्त मार्ग पर सुरक्षा के व्यापक प्रबन्ध थे और जनता हेतु अलग व्यवस्था बनाई गई थी।

महाराज पीताम्बर ओढ़े पैदल ही मन्दिर की ओर बढ़े आ रहे थे, साथ में थे महाकवि कालिदास, महामंत क्षपणक और महामात्य शंकु के साथ प्रधान पुजारी पिंगल

शीघ्र ही महाराज मन्दिर प्रांगण में थे और आचार्य पिंगल ने महाकाल के अभिषेक की विधियाँ आरम्भ कर दी थी। वेदपाठी ब्राह्मणों द्वारा पूजन का प्रारंभिक कार्य आरम्भ हो चुका था, पूरा वातावरण शिवमय हो चुका था।

महाराज ने दूर्वा और अक्षत के साथ संकल्प आरम्भ किया
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"यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति।
दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१॥"

अर्थ: जो मन जागते हुए मनुष्य से बहुत दूर तक चला जाता है, वही द्युतिमान् मन सुषुप्ति अवस्था में सोते हुए मनुष्य के समीप आकर लीन हो जाता है तथा जो दूरतक जाने वाला और जो प्रकाशमान श्रोत आदि इन्द्रियों को ज्योति देने वाला है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।

"येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः। यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२॥"

अर्थ: कर्म अनुष्ठान में तत्पर बुद्धि संपन्न मेधावी पुरुष यज्ञ में जिस मन से शुभ कर्मों को करते हैं, प्राजाजन के शरीर में और यज्ञीय पदार्थों के ज्ञान में जो मन अद्भुत पूज्य भाव से स्थित है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।

"यत् प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु। यस्मान्न ऋते किंचन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥३॥"

अर्थ: जो मन प्रकर्ष ज्ञान स्वरूप, चित्त स्वरूप और धैर्य रूप हैं; जो अविनाशी मन प्राणियों के भीतर ज्योति रूप से विद्यमान है और जिसकी सहायता के बिना कोई कर्म नहीं किया जा सकता, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।

"येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम्। येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥४॥"

अर्थ जिस शाश्वत मन के द्वारा भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्यकाल की सारी वस्तुएँ सब ओर से ज्ञात होती हैं और जिस मन के द्वारा सात होतावाला यज्ञ विस्तारित किया जाता है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।

"यस्मिन्नृचः साम यजूं गुँषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः। यस्मिंश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥५॥"

अर्थ: जिस मन में ऋग्वेद की ऋचाएँ और जिसमें सामवेद तथा यजुर्वेद के मंत्र उसी प्रकार प्रतिष्ठित है, जैसे रथ चक्र की नाभि में तीलियाँ जुड़े रहते हैं, जिस मन में प्रजाओं का सारा ज्ञान (पट में तंतु की भाँति) ओतप्रोत रहता है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।

"सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान् नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥६॥"

अर्थ: जो मन मनुष्य को अपनी इच्छा के अनुसार उसी प्रकार घुमाता है, जैसे कोई अच्छा सारथि लगाम के सहारे वेगवान् घोड़ों को अपनी इच्छा के अनुसार नियंत्रित करता है; बाल्य, यौवन, वार्धक्य आदि से रहित तथा अति वेगवान् जो मन हृदय में स्थित है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।

इसके पश्चात गणपति का आवाहन किया गया।

"गणानां त्वा गणपतिं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे।
निधीनां त्वा निधिपतिं हवामहे वसो मम् आहमजानि
गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ।।"

अर्थात्- हे परमदेव गणेशजी ! समस्त गणों के अधिपति एवं प्रिय पदार्थों प्राणियों के पालक और समस्त सुखनिधियों के निधिपति ! आपका हम आवाहन करते हैं । आप सृष्टि को उत्पन्न करने वाले हैं, हिरण्यगर्भ को धारण करने वाले अर्थात् संसार को अपने-आप में धारण करने वाली प्रकृति के भी स्वामी हैं,
आपको हम प्राप्त हों ।।

तत्पश्चात् रुद्राभिषेक आरम्भ हुआ, और रुद्रीपाठ और शिवस्तव  के पाठ से सम्पूर्ण माहौल शिवमय हो गया। जय महाकाल और हर-हर महादेव के जयघोष से सम्पूर्ण दिशाएँ गुंजित हो उठीं।

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उधर शोडास और खारोस के नेतृत्व में शकसेना गंगा पार कर तेजी से आगे बढ़ रहे थे,
ये वो क्षेत्र था जहाँ आज कन्नौज है, कन्नौज से बढ़ कर अब शक सेना कालपी तक पहुँच चुकी थी और इधर मालवा के गुप्तचरों की टोली छद्मवेश में उन्हें भ्रमित करने की कोशिश में थे।

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महाकाल की अर्चना समाप्त हो चुकी थी कि महामन्त क्षपणक का विशेष गुप्तचर एक संदेश लेकर प्रस्तुत हुआ, महामंत ने उसे संकेत से रुकने का आदेश दिया और स्वयं आगे बढ़कर उसको साथ ले माँ शिप्रा के तट की ओर बढ़ चले।

महामंत: कहो गुप्तचर,क्या समाचार है??

गुप्तचर: महामंत की जय हो, शकसेना हमारी उत्तरी सीमा के निकट है और तेजी से आगे बढ़ रही है। हमारे गुप्तसैन्य दल उनकी सेना में शामिल हो चुके हैं। मार्ग के दस्युओं को भी प्रशिक्षित कर दिया गया है कि वे शक सेना को वही मार्ग बतलायें जिसपर हम उन्हें ले जाना चाहते हैं।

महामंत: उत्तम, अब यदि शकों की सेना उस लवणीय दलदल की ओर बढ़ गई तो हमारा कार्य सरल हो जाएगा, फिर पीछे से दस्युसेना उनपर आक्रमण कर देगी और जो बचेंगे उनको प्रत्यक्ष युद्ध द्वारा परास्त किया जाएगा।

गुप्तचर: महामंत, शोडास ने अपनी सेना के तीन भाग किये हैं। एक का नेतृत्व वह स्वयं, दूसरे का युवराज खारोस और तीसरे का उसके सेनापति कर रहे हैं।
प्राप्त सूचना के अनुसार शोडास दक्षिण की ओर, खारोस पश्चिम की ओर और शक सेनापति पूर्व की ओर बढ़ रहे हैं।

महामंत: ओह! अर्थात हमें तीन मोर्चों पर युद्ध के लिए सज़्ज़ रहना होगा
तुमने ये बहुत महत्त्वपूर्ण बात बताई, लो तुम्हारा पुरस्कार।

और महामंत ने अपने हाथ से रत्नजड़ित अंगूठी उतारकर गुप्तचर को दे दी।

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महामंत गुप्तचर को विदा कर तीव्रता से महाराज की ओर बढ़े, और उन्हें रुकने का संकेत दिया।

महाराज अपने साथ महामात्य शंकु, महाकवि कालिदास और महामंत क्षपणक को लेकर विशेष शिविर की ओर बढ़ चले।

"कहिये महामंत, क्या सूचना है??"

"महाराज, शकराज शोडास मालवा पर तीन ओर से आक्रमण की योजना बनाये बैठा है, पूर्व से उसकी सेना का नेतृत्व उसका सेनापति कर रहा है, पश्चिम से शकों का युवराज खारोस और उत्तर से स्वयं शोडास है।
ऐसे में हमें तीनों मोर्चों पर सज़्ज़ रहना होगा।
पूर्व की टुकड़ी को शाल्व-वन में उलझाने की योजना है और उनसे दस्युओं की सेना निपट लेगी।
उत्तर की तरफ से आप स्वयं ही होंगे किन्तु पश्चिम की तरफ से आक्रमण होने की दशा में हम अभी तैयार नहीं हैं।

महाराज: महामन्त, निश्चिंत रहें, यदि आक्रमण पश्चिम से हुआ तो उसके लिए शकसेना को कामधेनु चर्मण्यवती और वेत्रवती को पार करना होगा, जिनकी घाटियों को हम अपने उपयोग में ला सकते हैं।
सेनापति अपिलक की टुकड़ी को पश्चिमी सीमा पर, महाकवि कालिदास की टुकड़ी को दक्षिणी सीमा पर, अमरसिंह जी की टुकड़ी को पूर्वी सीमा पर भेजा जाए, उत्तरी सीमा का नेतृत्व मैं स्वयं करूँगा, हम यहीं से अपने मोर्चों की ओर प्रस्थान करेंगे, किन्तु शस्त्रपूजन के पश्चात
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उधर शोडास वेत्रवती नदी के उस पार गहन वनों में पहुँच चुका था जहाँ से लवणीय दलदली भूमि का क्षेत्र प्रारम्भ होता था।
पूर्व से शक सेनापति भी सेना की दूसरी टुकड़ी के साथ विन्ध्य के शाल्व वनों में पहुँच चुका था।
और पश्चिम से शक-युवराज खारोस भी चर्मण्यवती के उस पार पहुँच गया था जहाँ से चर्मण्यवती की घाटियों में भी प्रशिक्षित दस्यु सेना उसके स्वागत को तैयार बैठी थी।
शोडास का मानना था कि तीन तरफ से आक्रमण यदि एक साथ होगा तो मालवा की सेना इससे निपट नहीं पाएगी और भयभीत हो जाएगी और इस तरह वह आसानी से उज्जयिनी पर अपना आधिपत्य स्थापित कर सकेगा।
इसके अतिरिक्त भी उसने अपने सैनिकों को आंतरिक हमले के लिए साधुवेश में कुंभ में शामिल करने की योजना बना रखी थी

किन्तु इस बार उसके सामने थे महाराज विक्रमादित्य

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इधर उज्जयिनी में महाराज विक्रमादित्य शस्त्रपूजन हेतु माँ हरिसिद्धि के मंदिर में पहुँच चुके थे, विशाल घण्टों के और नगाड़ों के तुमुल नाद से आकाश-पर्यन्त निनादित हो उठा।

महाराज ने स्तुति प्रारम्भ की,

" रक्ष रक्ष महादेवि दुर्गे दुर्गतिनाशिनि।
मां भक्त मनुरक्तं च शत्रुग्रस्तं कृपामयि॥

विष्णुमाये महाभागे नारायणि सनातनि।
ब्रह्मस्वरूपे परमे नित्यानन्दस्वरूपिणी॥

त्वं च ब्रह्मादिदेवानामम्बिके जगदम्बिके।
त्वं साकारे च गुणतो निराकारे च निर्गुणात्॥

मायया पुरुषस्त्वं च मायया प्रकृति: स्वयम्।
तयो: परं ब्रह्म परं त्वं बिभर्षि सनातनि॥

वेदानां जननी त्वं च सावित्री च परात्परा।
वैकुण्ठे च महालक्ष्मी: सर्वसम्पत्स्वरूपिणी॥

म‌र्त्यलक्ष्मीश्च क्षीरोदे कामिनी शेषशायिन:।
स्वर्गेषु स्वर्गलक्ष्मीस्त्वं राजलक्ष्मीश्च भूतले॥

नागादिलक्ष्मी: पाताले गृहेषु गृहदेवता।
सर्वशस्यस्वरूपा त्वं सर्वैश्वर्यविधायिनी॥

रागाधिष्ठातृदेवी त्वं ब्रह्मणश्च सरस्वती।
प्राणानामधिदेवी त्वं कृष्णस्य परमात्मन:॥

गोलोके च स्वयं राधा श्रीकृष्णस्यैव वक्षसि।
गोलोकाधिष्ठिता देवी वृन्दावनवने वने॥

श्रीरासमण्डले रम्या वृन्दावनविनोदिनी।
शतश्रृङ्गाधिदेवी त्वं नामन चित्रावलीति च॥

दक्षकन्या कुत्र कल्पे कुत्र कल्पे च शैलजा।
देवमातादितिस्त्वं च सर्वाधारा वसुन्धरा॥

त्वमेव गङ्गा तुलसी त्वं च स्वाहा स्वधा सती।
त्वदंशांशांशकलया सर्वदेवादियोषित:॥

स्त्रीरूपं चापिपुरुषं देवि त्वं च नपुंसकम्।
वृक्षाणां वृक्षरूपा त्वं सृष्टा चाङ्कुररूपिणी॥

वह्नौ च दाहिकाशक्ति र्जले शैत्यस्वरूपिणी।
सूर्ये तेज:स्वरूपा च प्रभारूपा च संततम्॥

गन्धरूपा च भूमौ च आकाशे शब्दरूपिणी।
शोभास्वरूपा चन्द्रे च पद्मसङ्घे च निश्चितम्॥

सृष्टौ सृष्टिस्वरूपा च पालने परिपालिका।
महामारी च संहारे जले च जलरूपिणी॥

क्षुत्त्‍‌वं दया त्वं निद्रा त्वं तृष्णा त्वं बुद्धिरूपिणी।
तुष्टिस्त्वं चापि पुष्टिस्त्वं श्रद्धा त्वं च क्षमा स्वयम्॥

शान्तिस्त्वं च स्वयं भ्रान्ति: कान्तिस्त्वं कीर्तिरेव च।
लज्जा त्वं च तथा माया भुक्ति मुक्ति स्वरूपिणी॥

सर्वशक्ति स्वरूपा त्वं सर्वसम्पत्प्रदायिनी।
वेदेऽनिर्वचनीया त्वं त्वां न जानाति कश्चन॥

सहस्त्रवक्त्रस्त्वां स्तोतुं न च शक्त : सुरेश्वरि।
वेदा न शक्ता: को विद्वान् न च शक्ता सरस्वती॥

स्वयं विधाता शक्तो न न च विष्णु: सनातन:।
किं स्तौमि पञ्चवक्त्रेण रणत्रस्तो महेश्वरि॥

कृपां कुरु महामाये मम शत्रुक्षयं कुरु।"

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इसी के साथ शस्त्रों का पूजन भी सम्पन्न हुआ, अब बारी थी महाराज के द्वारा सेना को सम्बोधित करने की।

महाराज मन्दिर से निकलकर सीधे ही आयुधभवन गए, अपना सैनिकवेश धारण किया और सैनिकों के बीच अभ्यास क्षेत्र में पहुँच गए।

अभ्यास क्षेत्र एक वृहद मैदान था जिसके ठीक पूर्व में एक ऊँचा प्रस्तर-मंच बना था। महाराज बिना देर किए उस मंच पर गए और अपना सम्बोधन आरम्भ किया।

"मेरे प्रिय वीरों
जय महाकाल

जैसा कि आपको विदित है कि हमारी मातृभूमि की धरित्री आक्रमणकारी शकों से आप्त है, शकों की सेना अब उज्जयिनी की ओर बढ़ रही है और यही क्षण है जब हमें स्वयं के भीतर के महाकाल को जाग्रत करना है।
हमें शक सेना को यह बता देना है कि उज्जयिनी का प्रत्येक सैनिक स्वतः काल है, हमें युद्धभूमि में वह पराक्रम दिखाना है कि शत्रुसेना के हृदय कम्पित हो जायें और उनकी भारतभूमि से जाना ही पड़े।

जय महाकाल, जय महाकाली"

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इसके पश्चात महाराज ने अपने सभी सेनापतियों और प्रमुखों को एकत्र किया और योजना बताना आरम्भ किया।

"मालव-वीरों, मातृभूमि पुकार रही है, हमें अपना सर्वस्व मातृभूमि पर अर्पण करने का अवसर प्राप्त हुआ है, अतः मेरी बात ध्यान से सुनिए।

सेना के तीन भाग होने हैं जिसमें से प्रथम भाग सेनापति अपिलक के नेतृत्व में राज्य की पश्चिमी सीमा पर चर्मण्यवती की घाटियों में फैलकर खारोस और उसकी सेना को आगे बढ़ने से रोकेगा। हमारी रणनीति शक-सेना को उन्हीं बीहड़ घाटियों में उलझा कर समाप्त कर देने की होगी। आचार्य वेतालभट्ट भी तंत्र-प्रयोग हेतु सेनापति अपिलक के साथ जायेंगे।

द्वितीय भाग अमरसिंह जी के नेतृत्व में विन्ध्य के गहन शाल्व वनों में फैल जाएगा, जहाँ दस्युसेना हमारा सहयोग करेगी।

और तीसरा तथा अंतिम भाग मेरे साथ उत्तरी सीमा पर वेत्रवती के गहन वनों के बीच की लवणीय भूमि और दलदलों में शोडास को उलझाने का कार्य करेगा, कुछ युद्ध प्रत्यक्ष होगा तो कुछ परोक्ष"

"दक्षिण क्षेत्र की सुरक्षा हेतु महाकवि सेना के साथ गए ही हैं जहाँ सम्मिलित संघ-सेना उनका साथ देगी। मेरे साथ वैद्यराज धन्वन्तरि, महामात्य क्षपणक और महामन्त शंकु भी आयेंगे।"

महाराज के सम्बोधन ने सम्पूर्ण सेना के उत्साह में वृद्धि कर दी थी, अतिरेक में सेना ने हर हर महादेव के जयघोष से आकाश को गुंजायमान कर दिया।

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इसके पश्चात सेना निर्धारित योजनानुसार विभाजित कर दी गई।
सेनापति अपिलक के साथ आचार्य वेतालभट्ट और 21000 पैदल सैनिक और  2700 घुड़सवार थे।

अमरसिंह  जी के साथ 13000 पैदल सैनिक, 1200 घुड़सवार और वृह्न्तिका नामक आयुध (जो प्रस्तर-खंडों को गोले की भाँति शत्रु सेना पर बरसाता था) भेजा गया।

अब बचा अंतिम हिस्सा जिसमें 12000 पैदल सैनिक, 2000 के लगभग घुड़सवार और 170 हाथियों का एक दल था।

महाराज ने अपने साथ सम्पूर्ण हस्ति-दल और मात्र 4000 पैदल सैनिक और 1000 घुड़सवार रखे और शेष सभी सैनिकों को महामंत शंकु के नेतृत्व में राज्य की और कुंभ महोत्सव की व्यवस्था के लिए छोड़ दिया।

★★★★★★★

उधर खारोस जो चर्मण्यवती की गहरी घाटियों और नदी की प्रकृति से पूर्णतः अंजान था, नदी पार करने की योजना बना रहा था।

और उन घाटियों में फैले दस्युसैनिक और सेनापति अपिलक के साथ सभी मालव सैनिक इंतज़ार कर रहे थे, युद्ध के प्रारम्भ का

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पूर्व के शाल्ववनों में हलचल देखी गई है आर्य, एक गुप्तचर ने आकर अमरसिंह को सूचित किया।

"स्पष्ट कहो गुप्तचर"

"आर्य वेशभूषा से तो वे शक सैनिक ही प्रतीत होते हैं, उन्हें दस्यु-बस्ती की ओर बढ़ते देखा गया है।"

"दस्यु-सैनिकों से कहो सज़्ज़ रहें, हमारी सेना पर्वतों के मध्य में रहेगी। दस्यु सैनिक शक सेना को उलझाकर घाटी के मध्य लायेंगे जिससे शक सेना पर द्विदिशीय आक्रमण किया जा सके।"

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उधर उत्तरी सीमा पर शोडास वेत्रवती नदी को पार करने की योजना पर कार्य कर रहा था, चूंकि उसने कान्यकुब्ज के समीप गंगा पर पुल का निर्माण कर लिया था अतः उसे अब पुल निर्माण का अनुभव भी हो चुका था और इसीलिए वह वेत्रवती पर पुल बनाने की योजना में था।

वेत्रवती के दूसरी ओर मालव सेना ने नदी से मार्ग बनाना प्रारम्भ कर दिया था जो कि एक भूलभुलैया जैसा था और जिसके मध्य थी विशाल लवणीय दलदली भूमि जो शोडास की सेना को अपार क्षति पहुँचा सकती थी।

इसके आगे का भाग प्रभु इच्छा पर

NeeRaj Kumar Gupta



Comments

  1. Ayala bhag Jan ayga batao Bhai pls

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  2. कहानी का प्रवाह अपने वेग पर था
    लेकिन आगे प्रभु की इच्छा पर बात रुक गई??
    क्या आगे की कहानी प्रकाशित हुई है?
    यदि हां तो कैसे पढ़ें? यदि ना, तो प्रभु कब इच्छा करेंगे 😁😁
    🙏🏼🙏🏼

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  3. अभी एक लघु उपन्यास भंवर पर काम कर रहा हूँ। वो पूरी होते ही इस कथानक को पूरा करूँगा।

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