मुन्तज़िर
दिल हथेली पर रखने का शायद
बस इतना ये हुआ असर है,
कि हर ख़्वाब मेरे आँखों का
आज हूबहू कागज पर है
मेरी आरजू न थी
जिस गुलशन की रानाईयों को
वहाँ चर्चे मेरी आज तक भी होते हैं
मेरी हर फ़तह और शिकस्त के पीछे
जिस शख्स का इल्हाम हुआ करता था
मेरी ये नज़रें आज तक ढूँढती हैं उसको
मेरा दिल कल भी बस मुन्तज़िर था
मेरा दिल आज भी बस मुन्तज़िर ही है
इक अधूरे इश्क़ की सदा आती है
जिसकी आवाज मैं दिल की धड़कनों में सुनता हूँ
अधूरे राब्ते थे कुछ जिनको कागजों पर लिख लेता हूँ
वक्त की स्याही लेकिन उन्हें पूरा होने नहीं देती
जाने कौन सी खता की ये उकूबत है
कि आँखों की दवात अश्कों की स्याही बरसाती है
और मेरे नज़्मों के हर अल्फ़ाज़ डूब जाते हैं
सोचता हूँ ऐसे हालात में जाने
कब मुक़म्मल होगी ये अल्फाजों की किताब
NeeRaj K. Gupta
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